विभूतियोग
श्री भगवान् का ऐश्वर्य • Yoga through Appreciating the Infinite Opulences of God
42 Verses
Chapter Summary
भगवद गीता का दसवां अध्याय विभूतियोग है। इस अध्याय में, कृष्ण स्वयं को सभी कारणों के कारण बताते हैं। अर्जुन की भक्ति को बढ़ाने के लिए वे अपने विभिन्न अवतारों और प्रतिष्ठानों का वर्णन करते हैं। अर्जुन पूरी तरह से भगवान के सर्वोच्च पद से आश्वस्त हैं और उन्हें सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में घोषित करते हैं। वे कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी अन्य दिव्य महिमाओं के बारेमे बताएं जो कि सुनने में अमृत सामान हैं।
The tenth chapter of the Bhagavad Gita is Vibhooti Yoga. In this chapter, Krishna reveals Himself as the cause of all causes. He describes His various manifestations and opulences in order to increase Arjuna's Bhakti. Arjuna is fully convinced of Lord's paramount position and proclaims him to be the Supreme Personality. He prays to Krishna to describe more of His divine glories which are like nectar to hear.
श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ||१०-१||
śrībhagavānuvāca . bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ . yatte.ahaṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā ||10-1||
T Translation
।।10.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो ! पुन: तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।
C Commentary
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ||१०-२||
na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ . ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ ||10-2||
T Translation
।।10.2।। मेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।
C Commentary
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् | असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ||१०-३||
yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram . asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate ||10-3||
T Translation
।।10.3।। जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है, र्मत्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।।
C Commentary
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः | सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ||१०-४||
buddhirjñānamasammohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ . sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo.abhāvo bhayaṃ cābhayameva ca ||10-4||
T Translation
।।10.4।। बुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य, दम (इन्द्रिय संयम), शम (मन: संयम), सुख, दु:ख, जन्म और मृत्यु, भय और अभय।।
C Commentary
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ||१०-५||
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo.ayaśaḥ . bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ ||10-5||
T Translation
।।10.5।। अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान. यश और अपयश ऐसे ये प्राणियों के नानाविध भाव मुझ से ही प्रकट होते हैं।।
C Commentary
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा | मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ||१०-६||
maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavastathā . madbhāvā mānasā jātā yeṣāṃ loka imāḥ prajāḥ ||10-6||
T Translation
।।10.6।। सात महर्षिजन, पूर्वकाल के चार (सनकादि) तथा (चौदह) मनु ये मेरे प्रभाव वाले मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार (लोक) में यह प्रजा है।।
C Commentary
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः | सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ||१०-७||
etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ . so.avikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ ||10-7||
T Translation
।।10.7।। जो पुरुष इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता है, वह पुरुष अविकम्प योग (अर्थात् निश्चल ध्यान योग) से युक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।
C Commentary
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ||१०-८||
ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate . iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ ||10-8||
T Translation
।।10.8।। मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।
C Commentary
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ||१०-९||
maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam . kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca ||10-9||
T Translation
।।10.9।। मुझमें ही चित्त को स्थिर करने वाले और मुझमें ही प्राणों (इन्द्रियों) को अर्पित करने वाले भक्तजन, सदैव परस्पर मेरा बोध कराते हुए, मेरे ही विषय में कथन करते हुए सन्तुष्ट होते हैं और रमते हैं।।
C Commentary
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् | ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ||१०-१०||
teṣāṃ satatayuktānāṃ bhajatāṃ prītipūrvakam . dadāmi buddhiyogaṃ taṃ yena māmupayānti te ||10-10||
T Translation
।।10.10।। उन (मुझ से) नित्य युक्त हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को, मैं वह 'बुद्धियोग' देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।।
C Commentary
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः | नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ||१०-११||
teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ . nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā ||10-11||
T Translation
।।10.11।। उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अन्त:करण में स्थित होकर, अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ।।
C Commentary
अर्जुन उवाच | परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् | पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ||१०-१२||
arjuna uvāca . paraṃ brahma paraṃ dhāma pavitraṃ paramaṃ bhavān . puruṣaṃ śāśvataṃ divyamādidevamajaṃ vibhum ||10-12||
T Translation
।।10.12।। अर्जुन ने कहा आप -परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हंै; सनातन दिव्य पुरुष, देवों के भी आदि देव, जन्म रहित और सर्वव्यापी हैं।।
C Commentary
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा | असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ||१०-१३||
āhustvāmṛṣayaḥ sarve devarṣirnāradastathā . asito devalo vyāsaḥ svayaṃ caiva bravīṣi me ||10-13||
T Translation
।।10.13।। ऐसा आपको समस्त ऋषिजन कहते हैं; वैसे ही देवर्षि नारद, असित, देवल ऋषि तथा व्यास और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।।
C Commentary
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव | न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ||१०-१४||
sarvametadṛtaṃ manye yanmāṃ vadasi keśava . na hi te bhagavanvyaktiṃ vidurdevā na dānavāḥ ||10-14||
T Translation
।।10.14।। हे केशव ! जो कुछ भी आप मेरे प्रति कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्, आपके (वास्तविक) स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।।
C Commentary
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम | भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ||१०-१५||
svayamevātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama . bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate ||10-15||
T Translation
।।10.15।। हे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवों के देव ! हे जगत् के स्वामी ! आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं।।
C Commentary
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः | याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ||१०-१६||
vaktumarhasyaśeṣeṇa divyā hyātmavibhūtayaḥ . yābhirvibhūtibhirlokānimāṃstvaṃ vyāpya tiṣṭhasi ||10-16||
T Translation
।।10.16।। आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को अशेषत: कहने के लिए योग्य हैं, जिन विभूतियों के द्वारा इन समस्त लोकों को आप व्याप्त करके स्थित हैं।।
C Commentary
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् | केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ||१०-१७||
kathaṃ vidyāmahaṃ yogiṃstvāṃ sadā paricintayan . keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo.asi bhagavanmayā ||10-17||
T Translation
।।10.17।। हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ, और हे भगवन् ! आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं।।
C Commentary
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ||१०-१८||
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana . bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me.amṛtam ||10-18||
T Translation
।।10.18।। हे जनार्दन ! अपनी योग शक्ति और विभूति को पुन: विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।।
C Commentary
श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः | प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ||१०-१९||
śrībhagavānuvāca . hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ . prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me ||10-19||
T Translation
।।10.19।। श्रीभगवान् ने कहा -हन्त अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा। हे कुरुश्रेष्ठ मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।।
C Commentary
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः | अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ||१०-२०||
ahamātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ . ahamādiśca madhyaṃ ca bhūtānāmanta eva ca ||10-20||
T Translation
।।10.20।। हे गुडाकेश (निद्राजित्) ! मैं समस्त भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।।