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Vijay Yadav

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Vijay Yadav

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नमस्ते! मेरा नाम विजय यादव है। मुझे सनातन धर्म, वैदिक साहित्य, हिंदू शास्त्रों और भारतीय इतिहास के अध्ययन में विशेष रुचि है। मेरा उद्देश्य प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर ज्ञानवर्धक एवं तथ्यपूर्ण लेखों के माध्यम से पाठकों तक सनातन परंपरा की सही जानकारी पहुँचाना है। मैं हिंदू धर्म से जुड़े विषयों, शास्त्रीय संदर्भों, ऐतिहासिक तथ्यों तथा प्रचलित भ्रांतियों पर शोधपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ। मेरा विश्वास है कि सत्य, ज्ञान और धर्म के मूल सिद्धांतों को समझकर हम अपनी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विरासत को बेहतर ढंग से जान सकते हैं।

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क्या भगवद गीता में श्रीकृष्ण के बयानों में विरोधाभास है?

​1. अजन्मा होकर भी जन्म लेना (गीता 4.5 और 10.3 का समन्वय) ​जब श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके अनेक जन्म हो चुके हैं, तो वे अपनी योगमाया की शक्ति की बात कर रहे होते हैं, न कि किसी साधारण मनुष्य की तरह कर्मों के बंधन में बंधकर जन्म लेने की। ​गीता 4.6 (अजोऽपि सन्नव्ययात्मा...) के भाष्य में आदि शंकराचार्य जी लिखते हैं ​स्वमायया देवानिव जात इव च लोकस्य प्रतिभासते, न परमार्थतः। अर्थात - भगवान नित्य, शुद्ध और मुक्त स्वभाव वाले हैं। वे वास्तव में जन्म नहीं लेते। वे अपनी माया के जरिए अज्ञानियों को जन्मे हुए जैसे प्रतीत (Appear) होते हैं परमार्थ रूप में नहीं। ​सूर्य का सटीक उदाहरण - जैसे सूर्य रोज सुबह पूर्व में उदय (प्रकट) होता है और शाम को अस्त (ओझल) होता है इसका मतलब यह नहीं कि सूर्य रोज सुबह नया पैदा होता है। ठीक वैसे ही, श्रीकृष्ण का अवतार संसार में प्रकट और अप्रकट होता है, लेकिन उनका मूल स्वरूप हमेशा अजन्मा (Unborn) ही रहता है। ​2. प्रकृति और पुरुष का अनादि होना (गीता 13.20 का रहस्य) ​आलोचकों का दूसरा भ्रम यह है कि अगर प्रकृति और पुरुष भी अनादि (बिना शुरुआत के) हैं, तो कृष्ण सर्वोच्च कैसे हुए? ​आदि शंकराचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि यहाँ अनादि होने का अर्थ ईश्वर के समान स्वतंत्र होना नहीं है ​ईश्वर की शक्तियाँ ~ प्रकृति (जड़) और पुरुष (चेतन जीवात्मा) कोई स्वतंत्र तत्व नहीं हैं बल्कि ये ईश्वर (ब्रह्म) की ही दो सनातन शक्तियाँ (Prakriti/Nature) हैं। चूंकि ईश्वर अनादि हैं, इसलिए उनकी शक्तियाँ भी अनादि हैं। ​पराधीनता ~ जैसे आग और उसकी गर्मी को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही ईश्वर और उनकी ये दो प्रकृतियाँ अनादि काल से साथ हैं लेकिन इनका नियंता (Controller) केवल और केवल ईश्वर ही है।  श्लोकों का सही संदर्भ (Context) आलोचक सिर्फ भ्रम फैलाने के लिए अलग-अलग संदर्भों को मिक्स कर देते हैं। इसे इस टेबल से आसानी से समझा जा सकता है श्लोक दृष्टिकोण (Context) दार्शनिक अर्थ (Philosophical Meaning) गीता 4.5 व्यावहारिक (अवतार रूप) धर्म की रक्षा के लिए समय-समय पर साकार रूप में प्रकट होना। गीता 10.3 परमार्थिक (वास्तविक रूप) मूल सच्चिदानंद स्वरूप से हमेशा अजन्मा और नित्य रहना। गीता 13.20 तत्व-मीमांसा (Metaphysics) प्रकृति और जीव को ईश्वर की ही अनादि शक्तियां बताना।   निष्कर्ष (Conclusion) भगवद गीता पूर्णत तार्किक और विज्ञानसम्मत है। श्रीकृष्ण तत्व रूप में अजन्मा और अनादि ही हैं, जो अपनी दिव्य इच्छा (योगमाया) से संसार के कल्याण के लिए अवतार रूप में प्रकट होते हैं। इसलिए इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।

2 weeks ago 1101 Views
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तुम तिलक हमारे माथे का - आत्मविश्वास, संघर्ष और स्वराज का संदेश

कभी-कभी कुछ पंक्तियाँ केवल कविता नहीं होतीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा बन जाती हैं। तुम तिलक हमारे माथे का ऐसी ही एक प्रेरणादायक रचना है, जो मनुष्य को उ...

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