200)"
@keydown.escape.window="jumpModalOpen = false"
class="max-w-screen-xl mx-auto px-4 sm:px-6 lg:px-8 py-8 relative min-h-screen">
Quick Reader Controls
Select chapter, verse, and switch translation or commentary
Bhagavad Gita
Chapter 11, Verse 4
विश्वरूपदर्शनयोग - विराट रूप
Chapter 11 • Verse 4
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो | योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ||११-४||
manyase yadi tacchakyaṃ mayā draṣṭumiti prabho . yogeśvara tato me tvaṃ darśayātmānamavyayam ||11-4||
T Translation
।।11.4।। हे प्रभो ! यदि आप मानते हैं कि मेरे द्वारा वह आपका रूप देखा जाना संभव है, तो हे योगेश्वर ! आप अपने अव्यय रूप का दर्शन कराइये।।
C Commentary
।।11.4।। --,मन्यसे चिन्तयसि यदि मया अर्जुनेन तत् शक्यं द्रष्टुम् इति प्रभो? स्वामिन्? योगेश्वर योगिनो योगाः? तेषां ईश्वरः योगेश्वरः? हे योगेश्वर। यस्मात् अहम् अतीव अर्थी द्रष्टुम्? ततः तस्मात् मे मदर्थं दर्शय त्वम् आत्मानम् अव्ययम्।।एवं चोदितः अर्जुनेन श्री भगवान् उवाच --,