क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चयनात्मक है?
क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में सभी के लिए समान है, या धार्मिक पहचान, राजनीतिक विचारधारा और सामाजिक शक्ति के आधार पर इसके मानदंड बदल जाते हैं?
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क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में सभी के लिए समान है, या धार्मिक पहचान, राजनीतिक विचारधारा और सामाजिक शक्ति के आधार पर इसके मानदंड बदल जाते हैं?
भगवान श्रीकृष्ण ने कुब्जा के साथ शारीरिक अथवा कामुक संबंध स्थापित किए थे; इसलिए उनका चरित्र कामप्रधान था।
श्रीकृष्ण ने गोपियों के वस्त्र चुराकर उनके साथ अनैतिक, अश्लील और यौन उत्पीड़न जैसा व्यवहार किया; इसलिए कृष्ण का चरित्र नैतिक आदर्श नहीं माना जा सकता।
वाल्मीकि रामायण में अनेक श्लोक स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं कि भगवान श्रीराम मांस का सेवन करते थे।
स्वामी विवेकानन्द स्वयं गौमांस खाते थे और उन्होंने हिन्दुओं के लिए गौमांस भक्षण का समर्थन किया था।
शिव और विष्णु दो अलग-अलग तथा परस्पर प्रतिद्वन्द्वी सर्वोच्च देवता हैं, इसलिए शास्त्रों में एक को दूसरे से बड़ा सिद्ध किया गया है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान शिव को सती के मृत शरीर के साथ कामुक व्यवहार करते हुए दिखाया गया है, जिससे सिद्ध होता है कि वे 'नेक्रोफिलिक' थे।
ऋग्वेद और शतपथ ब्राह्मण पृथ्वी को 'चार कोनों वाली' बताते हैं, इसलिए वेद समतल पृथ्वी का समर्थन करते हैं।