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संकटमोचन हनुमान जी

श्री बजरंग बाण

Shree Bajrang Baan • रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अमोघ और अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र स्वरूप स्तुति, जो असाध्य संकटों, घोर शत्रु बाधाओं और तंत्र बाधाओं का तत्काल शमन करती है।

घोर संकटों से तत्काल मुक्ति, शत्रु बाधा निवारण, भूत-प्रेत भय नाश और जीवन में अजेय सुरक्षा कवच प्राप्त होता है।
2 दोहे
35 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

चौपाई चौपाई 1

जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

चौपाई चौपाई 2

जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

चौपाई चौपाई 3

जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

चौपाई चौपाई 4

आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुर लोका॥

चौपाई चौपाई 5

जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परम पद लीन्हा॥

चौपाई चौपाई 6

बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जम कातर तोरा॥

चौपाई चौपाई 7

अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

चौपाई चौपाई 8

लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥

चौपाई चौपाई 9

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥

चौपाई चौपाई 10

जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥

चौपाई चौपाई 11

जय गिरिधर जै जै सुख सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥

चौपाई चौपाई 12

ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

चौपाई चौपाई 13

गदा बज्र लै बैरिहि मारो। महारज प्रभु दास उबारो॥

चौपाई चौपाई 14

ॐकार हुंकार महाबीर धावो। बज्र गदा हनु बिलम्ब न लावो॥

चौपाई चौपाई 15

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरिउर शीशा॥

चौपाई चौपाई 16

सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥

चौपाई चौपाई 17

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥

चौपाई चौपाई 18

पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

चौपाई चौपाई 19

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥

चौपाई चौपाई 20

पांय परौं कर जोरि मनावौं। यहि अवसर अब केहि गोहरावौं॥

चौपाई चौपाई 21

जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥

चौपाई चौपाई 22

बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

चौपाई चौपाई 23

भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥

चौपाई चौपाई 24

इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

चौपाई चौपाई 25

जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥

चौपाई चौपाई 26

जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥

चौपाई चौपाई 27

चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥

चौपाई चौपाई 28

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥

चौपाई चौपाई 29

ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥

चौपाई चौपाई 30

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥

चौपाई चौपाई 31

अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥

चौपाई चौपाई 32

यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥

चौपाई चौपाई 33

पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्राण की॥

चौपाई चौपाई 34

यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥

चौपाई चौपाई 35

धूप देय जो जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

दोहा समापन दोहा

प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥