श्री धन्वंतरी चालीसा
Shree Dhanvantari Chalisa • रचयिता: पारंपरिक स्तुति
समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धन्वंतरी की सिद्ध चालीसा, जो संपूर्ण शारीरिक व मानसिक व्याधियों का शमन कर आरोग्य प्रदान करती है।
करूं वंदना गुरू चरण रज, ह्रदय राखी श्री राम। मातृ पितृ चरण नमन करूँ, प्रभु कीर्ति करूँ बखान ॥१॥
तव कीर्ति आदि अनंत है, विष्णुअवतार भिषक महान। हृदय में आकर विराजिए, जय धन्वंतरि भगवान ॥२॥
जय धन्वंतरि देवा सुखदाता। सकल विश्व के तुम आरोग्य विधाता॥
समुद्र मंथन में प्रगट भए। अमृत कलश कर में लए॥
देव-दनुज सब विस्मित कीन्हे। अमिय पिलाय देव पद दीन्हे॥
चार भुजा अति सुंदर धारे। शंख चक्र कर मध्य संवारे॥
जलौका औषध अमृत कलशा। हरहु सकल जन की दुसह त्रिशा॥
आयुर्वेद के आदि प्रणेता। सकल रोग हर मंगल केता॥
चरक सुश्रुत को ज्ञान सिखाया। शल्य-चिकित्सा पंथ चलाया॥
जड़ी-बूटी का भेद बताया। रोग-शोक सब दूर भगाया॥
वात पित्त कफ त्रिदोष निवारी। देह बनावहु निर्मल सारी॥
असाध्य व्याधि जो तन को घेरे। धन्वंतरि सुमिरे सब फेरे॥
नेत्र ज्योति अरु काया कांति। बुद्धि-विवेक बढ़े बल भांति॥
दीर्घायु का वर तुम देते। भक्तन के सब संकट हर लेते॥
धनतेरस को पूजे संसारा। घर-घर होत परम उजियारा॥
दीपक जलाय आरती उतारैं। धन्वंतरि प्रभु काज संवारैं॥
रोग ग्रस्त जो नर तव ध्यावै। काया कंचन सोई पावै॥
वैद्य हकीम सब तुम्हें मनाते। औषधि निर्माण सफलता पाते॥
महामारी से जगत बचाओ। अमृत वर्षा नित्य कराओ॥
दीन हीन की सुधि प्रभु लीजै। उत्तम स्वास्थ्य वरदान सुदीजै॥
जय जय जय धन्वंतरि भगवाना। कृपा करहु करुणामय ज्ञाना॥
तव पद पंकज शीश नवाऊं। रोग शोक से मुक्ति पाऊं॥
नित प्रति जो चालीसा गावे। ताके निकट रोग नहिं आवे॥
मन में शांति तेज तन छावै। प्रभु धन्वंतरि रक्षा करावै॥
शारीरिक मानसिक सब पीरा। हरहु कृपा करि हे रघुवीरा॥
काया निर्मल कान्ति अनूपा। जय धन्वंतरि विष्णु स्वरूपा॥
आयुर्वेद अमृत सम ज्ञाना। सकल विश्व में जाको माना॥
औषध रस रसायन दाता। तुम त्रिभुवन के पालनकर्ता॥
दुःख दारिद्र व्याधि नशावहु। स्वस्थ सुखी सब जगहि बनावहु॥
भक्त वत्सल प्रभु दया निधाना। राखहु लाज हमारी माना॥
हाथ जोड़ि जो स्तुति गावै। सुख सम्पति आरोग्य सो पावै॥
चारहुं वेद महिमा बतलाएं। सुर नर मुनि सब शीश नवाएं॥
महाप्रभु तुम दीन दयाला। हरहु भक्त के सकल जंजाला॥
अमृतमय कर कृपा अपारा। धन्य धन्य प्रभु अवतारा॥
सदा रहहु प्रभु ह्रदय समानी। जयति जयति आरोग्य खानी॥
नमो नमो हे जगदाधारा। पार करो मम भव संसारा॥
शरण तुम्हारी जो नर आया। अमृत जीवन उसने पाया॥
भय संशय सब दूर भगाओ। प्रेम भक्ति का दीप जलाओ॥
जो यह पाठ करे चालीसा। तापर कृपा करें जगदीशा॥
आरोग्य धन वैभव सो पावै। अंत समय प्रभु पद को जावै॥
धन्वंतरि प्रभु की जय बोली। आनंद रस से भर दी झोली॥
जय धन्वंतरि देवा स्वामी। घट घट वासी अंतरयामी॥
धन्वंतरि भगवान की, जो नित चालीसा गाय। रोग शोक संताप मिटें, परम शान्ति वह पाय॥