श्री कुबेर चालीसा
Shree Kuber Chalisa • रचयिता: पारंपरिक स्तुति
समस्त यक्षों और देवों के कोषाध्यक्ष धनपति कुबेर देव की कल्याणकारी चालीसा, जो आर्थिक तंगी दूर कर स्थायी धन-वैभव और सुख-शांति प्रदान करती है।
जैसे अटल हिमालय और जैसे अडिग सुमेर। ऐसे ही स्वर्ग द्वार पै, अविचल खड़े कुबेर॥
विघ्न हरण मंगल करण, सुनो शरणागत की टेर। भक्त हेतु प्रभु आप ही, पूर्ण करहु सब घेर॥
जै जै जै श्री कुबेर भण्डारी। धन माया के तुम अधिकारी॥
तप तेज पुंज निर्भय भय हारी। पवन वेग सम तनु बलधारी॥
स्वर्ग द्वार पै रहत पहारा। सेवक सब जन आज्ञाकारा॥
शिव के परम भक्त कहलाए। अलकापुरी के अधिपति पाए॥
एक समय शिव दर्शन कीन्हा। मन में भक्ति भाव अति लीन्हा॥
तप कीन्हो प्रभु मन चित लाई। शिव प्रसन्न हो दर्शन पाई॥
वर माँगा प्रभु भक्ति तुम्हारी। दीन दयाल सुनो त्रिपुरारी॥
शिव प्रसन्न वर दीन्हो भारी। धन के बनो तुम पहरेदारी॥
यक्षराज तुम पदवी पावो। सकल लोक में पूजे जावो॥
नव निधि अष्ट सिद्धि के स्वामी। जयति जयति प्रभु अंतरयामी॥
शंख पद्म मकर अरु कच्छा। मुकुंद कुंद नील महा रच्छा॥
सब निधि प्रभु के वश में होई। जो ध्यावे निर्धन नहिं कोई॥
दीन दुखी जब शरण में आवै। धन वैभव सो सहजहि पावै॥
ऋण संकट सब दूर नसावै। सुख सम्पति घर में लहरावै॥
व्यापार में नित लाभ करावो। विघ्न बाधा सब दूर भगावो॥
जो जन नियम से पाठ कराही। ता घर लक्ष्मी सदा समाही॥
दीपक जला धूप ध्यावै। कुबेर चालीसा प्रेम से गावै॥
कनक रत्न बहु पावे सोई। जापर कृपा कुबेर की होई॥
दरिद्रता का नाश करावे। यश वैभव चारों दिशि छावै॥
हे कुबेर प्रभु विनय हमारी। सुनो विनती तुम संकट हारी॥
हाथ जोड़ि प्रभु शीश नवाऊं। निशिदिन प्रभु तव गुण मैं गाऊं॥
कृपा दृष्टि हम पर भी कीजै। धन-धान्य का वर प्रभु दीजै॥
अन्न-वस्त्र की कमी न होई। सुखी रहे सब जग में कोई॥
भूत-पिशाच निकट नहिं आवैं। तुम्हरे डर से सब थर्रावैं॥
सकल मनोरथ पूर्ण कीजै। भक्ति भाव निज उर में दीजै॥
जय कुबेर जय जय धन दाता। तुम ही सब जग के सुख त्राता॥
दीन दयाल दया निधि प्यारे। हम हैं प्रभु तव शरण सहारे॥
पाप ताप सब दूर बहाओ। जीवन में आनंद बढ़ाओ॥
धर्म अर्थ काम मोक्ष पावै। जो कुबेर को शीश नवावै॥
अलकापुरी के राजा प्यारे। देव सकल जयकार उचारे॥
पुष्पक वाहन अति मनहारी। शोभा बरणी न जाए तुम्हारी॥
गदा चक्र कर सोहत भारी। जयति जयति यक्षेश्वर भण्डारी॥
मंगल मूर्ति रूप सुहावन। करहु भक्त का जीवन पावन॥
सदा सहाय रहहु मम काजा। जय जय जय कुबेर यक्षराजा॥
जो चालीसा पाठ करेगा। भव सागर से सहज तरेगा॥
पुत्र पौत्र धन धान्य बढ़ावे। सुख सम्पति जग में फैलावै॥
निश्चय प्रेम प्रतीति लगाई। कुबेर चालीसा जो जन गाई॥
ताके सब संकट मिटि जाई। कुबेर देव की कृपा समाई॥
बार बार प्रभु विनय सुनाऊं। चरण शरण में शीश नवाऊं॥
कुबेर कृपा सब पर बनी रहे। जन-जन मंगल गान कहे॥
धन धान्य से पूर्ण हो, सुख सम्पति मिल जाए। कुबेर कृपा जिस पर रहे, संकट दूर पलाए॥