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मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

श्री राम चालीसा

Shree Ram Chalisa • रचयिता: परम्परागत

रघुकुल तिलक, धर्म के साक्षात् विग्रह प्रभु श्री रामचन्द्र जी की महिमा और उनके पावन चरित्र का भक्तिपूर्ण गायन।

आत्मिक शुद्धि, धर्म-मार्ग पर अडिगता, पारिवारिक कलह का निवारण और परम शांति व सद्गति की प्राप्ति होती है।
8 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

निशिदिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥१॥

चौपाई चौपाई 1

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्म इन्द्र पार नहिं पाहीं॥

चौपाई चौपाई 2

दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना॥२॥

चौपाई चौपाई 3

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥

चौपाई चौपाई 4

तुम अनाथ के नाथ गुंसाई। दीनन के हो सदा सहाई॥३॥

चौपाई चौपाई 5

ब्रह्मादिक तव पारन पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥

चौपाई चौपाई 6

चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखीं॥४॥

चौपाई चौपाई 7

गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥

चौपाई चौपाई 8

नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥५॥

चौपाई चौपाई 9

राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥

चौपाई चौपाई 10

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥६॥

चौपाई चौपाई 11

शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥

चौपाई चौपाई 12

फूल समान रहत सो भारा। पाव न कोऊ तुम्हरो पारा॥७॥

चौपाई चौपाई 13

भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुं न रण में हारो॥

चौपाई चौपाई 14

नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥८॥

चौपाई चौपाई 15

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥

चौपाई चौपाई 16

ताते रण जीते नहिं कोई। युद्घ जुरे यमहूं किन होई॥९॥

चौपाई चौपाई 17

महालक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥

चौपाई चौपाई 18

सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥१०॥

चौपाई चौपाई 19

घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥

चौपाई चौपाई 20

सो तुमरे नित पांव पलोटत। नवो निद्घि चरणन में लोटत॥११॥

चौपाई चौपाई 21

सिद्घि अठारह मंगलकारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥

चौपाई चौपाई 22

औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥१२॥

चौपाई चौपाई 23

इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत न लागत पल की बारा॥

चौपाई चौपाई 24

जो तुम्हे चरणन चित लावै। ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥१३॥

चौपाई चौपाई 25

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। नर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥

चौपाई चौपाई 26

सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥१४॥

चौपाई चौपाई 27

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥

चौपाई चौपाई 28

सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं॥१५॥

चौपाई चौपाई 29

सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥

चौपाई चौपाई 30

तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥१६॥

चौपाई चौपाई 31

जो कुछ हो सो तुम ही राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥

चौपाई चौपाई 32

राम आत्मा पोषण हारे। जय जय दशरथ राज दुलारे॥१७॥

चौपाई चौपाई 33

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जगपति भूपा॥

चौपाई चौपाई 34

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥१८॥

चौपाई चौपाई 35

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥

चौपाई चौपाई 36

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुम ही हो हमरे तन मन धन॥१९॥

चौपाई चौपाई 37

याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥

चौपाई चौपाई 38

आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिर मेरा॥२०॥

चौपाई चौपाई 39

और आस मन में जो होई। मनवांछित फल पावे सोई॥

चौपाई चौपाई 40

तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥२१॥

दोहा समापन दोहा 1

साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्घता पावै॥

दोहा समापन दोहा 2

अन्त समय रघुबरपुर जाई। जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥२२॥

दोहा समापन दोहा 3

श्री हरिदास कहै अरु गावै। सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥२3॥

दोहा समापन दोहा 4

॥ दोहा॥

दोहा समापन दोहा 5

सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय। हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

दोहा समापन दोहा 6

राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय। जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय॥