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माँ सरस्वती (वीणावादिनी)

श्री सरस्वती चालीसा

Shree Saraswati Chalisa • रचयिता: परम्परागत

विद्या, ज्ञान, वाणी, संगीत एवं समस्त कलाओं की देवी भगवती सरस्वती की पावन स्तुति, जो विद्यार्थियों एवं साधकों को मेधा और विवेक प्रदान करती है।

स्मरण शक्ति में वृद्धि, परीक्षा में सफलता, कला और संगीत में दक्षता तथा वाणी में ओज व मधुरता आती है।
5 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

सरस्वती चालीसा सरस्वती चालीसा ॥दोहा॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

चौपाई चौपाई 1

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। दुष्जनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥

चौपाई चौपाई 2

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥

चौपाई चौपाई 3

जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥

चौपाई चौपाई 4

रूप चतुर्भुज धारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

चौपाई चौपाई 5

जग में पाप बुद्धि जब होती। तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥

चौपाई चौपाई 6

तब ही मातु का निज अवतारी। पाप हीन करती महतारी॥

चौपाई चौपाई 7

वाल्मीकिजी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥

चौपाई चौपाई 8

रामचरित जो रचे बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥

चौपाई चौपाई 9

कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

चौपाई चौपाई 10

तुलसी सूर आदि विद्वाना।भये और जो ज्ञानी नाना॥

चौपाई चौपाई 11

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा। केव कृपा आपकी अम्बा॥

चौपाई चौपाई 12

करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥

चौपाई चौपाई 13

पुत्र करहिं अपराध बहूता। तेहि न धरई चित माता॥

चौपाई चौपाई 14

राखु लाज जननि अब मेरी। विनय करउं भांति बहु तेरी॥

चौपाई चौपाई 15

मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥

चौपाई चौपाई 16

मधुकैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥

चौपाई चौपाई 17

समर हजार पाँच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥

चौपाई चौपाई 18

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥

चौपाई चौपाई 19

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

चौपाई चौपाई 20

चंड मुण्ड जो थे विख्याता। क्षण महु संहारे उन माता॥

चौपाई चौपाई 21

रक्त बीज से समरथ पापी। सुरमुनि हदय धरा सब काँपी॥

चौपाई चौपाई 22

काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा। बारबार बिन वउं जगदंबा॥

चौपाई चौपाई 23

जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा। क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥

चौपाई चौपाई 24

भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई। रामचन्द्र बनवास कराई॥

चौपाई चौपाई 25

एहिविधि रावण वध तू कीन्हा। सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥

चौपाई चौपाई 26

को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥

चौपाई चौपाई 27

विष्णु रुद्र जस कहिन मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

चौपाई चौपाई 28

रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥

चौपाई चौपाई 29

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

चौपाई चौपाई 30

दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

चौपाई चौपाई 31

नृप कोपित को मारन चाहे। कानन में घेरे मृग नाहे॥

चौपाई चौपाई 32

सागर मध्य पोत के भंजे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

चौपाई चौपाई 33

भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥

चौपाई चौपाई 34

नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करई न कोई॥

चौपाई चौपाई 35

पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥

चौपाई चौपाई 36

करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥

चौपाई चौपाई 37

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥

चौपाई चौपाई 38

भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥

चौपाई चौपाई 39

बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥

चौपाई चौपाई 40

रामसागर बाँधि हेतु भवानी। कीजै कृपा दास निज जानी।

दोहा समापन दोहा 1

॥दोहा॥

दोहा समापन दोहा 2

मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप। डूबन से रक्षा करहु परूँ न मैं भव कूप॥

दोहा समापन दोहा 3

बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु। राम सागर अधम को आश्रय तू ही दे दातु॥