Popular:
भगवान शिव (महादेव)

श्री शिव चालीसा

Shree Shiv Chalisa • रचयिता: अयोध्यादास

देवाधिदेव महादेव शिव शम्भु की अलौकिक महिमा, कल्याणकारी स्वरूप और पापनाशक शक्ति का गुणगान करने वाली अनुपम स्तुति।

मानसिक शांति, तनाव मुक्ति, अकाल मृत्यु भय निवारण, वैवाहिक सुख और भगवान भोलेनाथ की असीम अनुकम्पा प्राप्त होती है।
7 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

शिव चालीसा शिव चालीसा ॥ दोहा ॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

चौपाई चौपाई 1

॥ चौपाई ॥

चौपाई चौपाई 2

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

चौपाई चौपाई 3

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के ॥

चौपाई चौपाई 4

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

चौपाई चौपाई 5

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

चौपाई चौपाई 6

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

चौपाई चौपाई 7

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

चौपाई चौपाई 8

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

चौपाई चौपाई 9

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ ॥

चौपाई चौपाई 10

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

चौपाई चौपाई 11

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

चौपाई चौपाई 12

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

चौपाई चौपाई 13

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

चौपाई चौपाई 14

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

चौपाई चौपाई 15

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

चौपाई चौपाई 16

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

चौपाई चौपाई 17

वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

चौपाई चौपाई 18

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला ॥

चौपाई चौपाई 19

कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

चौपाई चौपाई 20

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

चौपाई चौपाई 21

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

चौपाई चौपाई 22

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

चौपाई चौपाई 23

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

चौपाई चौपाई 24

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी ॥

चौपाई चौपाई 25

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

चौपाई चौपाई 26

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

चौपाई चौपाई 27

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो ॥

चौपाई चौपाई 28

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई ॥

चौपाई चौपाई 29

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी ॥

चौपाई चौपाई 30

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

चौपाई चौपाई 31

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

चौपाई चौपाई 32

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

चौपाई चौपाई 33

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं ॥

चौपाई चौपाई 34

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

चौपाई चौपाई 35

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

चौपाई चौपाई 36

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी ॥

चौपाई चौपाई 37

पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

चौपाई चौपाई 38

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

चौपाई चौपाई 39

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

चौपाई चौपाई 40

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

दोहा समापन दोहा 1

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

दोहा समापन दोहा 2

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

दोहा समापन दोहा 3

॥ दोहा ॥

दोहा समापन दोहा 4

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥

दोहा समापन दोहा 5

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥