Popular:
भगवान श्री हरि विष्णु (जगतपालक)

श्री विष्णु चालीसा

Shree Vishnu Chalisa • रचयिता: परम्परागत

सृष्टि के पालनकर्ता, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान नारायण की पावन चालीसा, जिसके पाठ से जीवन में संतुलन और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

समस्त पापों का क्षय, पितृ दोष निवारण, जीवन में शांति और अंत काल में वैकुंठ धाम की प्राप्ति।
3 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

विष्णु चालीसा विष्णु चालीसा ॥दोहा॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।

चौपाई चौपाई 1

॥ चौपाई ॥

चौपाई चौपाई 2

नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

चौपाई चौपाई 3

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

चौपाई चौपाई 4

सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

चौपाई चौपाई 5

तन पर पीतांबर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥

चौपाई चौपाई 6

शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

चौपाई चौपाई 7

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

चौपाई चौपाई 8

संतभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

चौपाई चौपाई 9

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

चौपाई चौपाई 10

पाप काट भव सिंधु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

चौपाई चौपाई 11

करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥

चौपाई चौपाई 12

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥

चौपाई चौपाई 13

भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥

चौपाई चौपाई 14

आप वराह रूप बनाया। हरण्याक्ष को मार गिराया॥

चौपाई चौपाई 15

धर मत्स्य तन सिंधु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥

चौपाई चौपाई 16

अमिलख असुरन द्वंद मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥

चौपाई चौपाई 17

देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥

चौपाई चौपाई 18

कूर्म रूप धर सिंधु मझाया। मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥

चौपाई चौपाई 19

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥

चौपाई चौपाई 20

वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबंध उन्हें ढूँढवाया॥

चौपाई चौपाई 21

मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥

चौपाई चौपाई 22

असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लडाई॥

चौपाई चौपाई 23

हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥

चौपाई चौपाई 24

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥

चौपाई चौपाई 25

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

चौपाई चौपाई 26

देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

चौपाई चौपाई 27

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥

चौपाई चौपाई 28

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥

चौपाई चौपाई 29

गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

चौपाई चौपाई 30

हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

चौपाई चौपाई 31

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

चौपाई चौपाई 32

चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥

चौपाई चौपाई 33

जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

चौपाई चौपाई 34

शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

चौपाई चौपाई 35

करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

चौपाई चौपाई 36

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥

चौपाई चौपाई 37

सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥

चौपाई चौपाई 38

दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥

चौपाई चौपाई 39

पाप दोष संताप नशाओ। भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

चौपाई चौपाई 40

सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥

दोहा समापन दोहा

निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥