Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 5, मन्त्र 10

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 5 • मन्त्र 10

Katha Upanishad (Kathopanishad) 5.10

Mantra: 5.10 [Kathopanishad_5.10]

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार इस लोकमें प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है ॥ १० ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 वायुर्यथैक इत्यादि। प्राणात्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूपं 【भाष्यार्थ】 जिस प्रकार एक ही वायु प्राणरूपसे देहोंमें अनुप्रविष्ट होकर प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है 【शाङ्करभाष्यम्】 रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यादि समानम्॥ १०॥ 【भाष्यार्थ】 [उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है] इत्यादि पूर्ववत् ही समझना चाहिये ॥ १० ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एकस्य सर्वात्मत्वे संसार- दुःखित्वं परस्यैव तदिति प्राप्तमत इदमुच्यते-- 【भाष्यार्थ】 इस प्रकार एकहीकी सर्वात्मकता होनेपर संसारदुःखसे युक्त होना भी परमात्माका ही सिद्ध होता है; इसलिये ऐसा कहा जाता है--