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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 4 • Mantra 11

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 4 • मन्त्र 11

10.4.11

Mantra ID: 10.4.11

पै॒द्वस्य॑ मन्महे व॒यं स्थि॒रस्य॑ स्थि॒रधा॑म्नः । इ॒मे प॒श्चा पृदा॑कवः प्र॒दीध्य॑त आसते ॥ (११)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.4.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

स्थिर एवं स्थायी तेज वाले पैद्ध को हम मानते हैं. ये पश्च और पृदाकू नामक सर्पो को शोकमग्न करते हैं. (११)

EN English Translation

We consider the fixed and permanent fast path. They mourn the snakes called Pashcha and Pridaku. (11)

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