Popular:
अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 5 • Mantra 35

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 5 • मन्त्र 35

10.5.35

Mantra ID: 10.5.35

विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि सपत्न॒हा प्रा॒णसं॑शितः॒ पुरु॑षतेजाः । प्रा॒णमनु॒ वि क्र॑मे॒ऽहं प्रा॒णात्तं निर्भ॑जामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । स मा जी॑वी॒त्तं प्रा॒णो ज॑हातु ॥ (३५)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 10.5.35 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

तुम विष्णु के पराक्रम एवं शत्रुविनाशकर्ता हो. तुम प्राणों में स्थित हो एवं पुरुष तुम्हारा तेज है. हम प्राणों में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते है और उसे प्राण से दूर करते हैं. जो हम से द्वेष करता है अथवा हम जिस से द्वेष करते हैं, उस का विनाश हो. प्राण उस का त्याग कर दें. (३५)

EN English Translation

You are the destroyer of Vishnu's might and enemies. You are situated in the soul and the man is your radiance. We demonstrate our might in the soul and remove it from the soul. Let the one who hates us or the one we hate be destroyed. Give up life from him. (35)

卐 HinduText AI