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Bhagavad Gita

The Song of God

Q&A

गीता में 'निष्काम कर्म' का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या बिना किसी परिणाम की अपेक्षा के कर्म करना व्यावहारिक है?

नमस्ते विद्वतजनों, जब हम भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का श्लोक पढ़ते हैं: *कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।* *मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्...

क्या भगवद गीता में श्रीकृष्ण के बयानों में विरोधाभास है?
Myth

क्या भगवद गीता में श्रीकृष्ण के बयानों में विरोधाभास है?

आलोचकों का दावा भगवद गीता में एक तरफ श्रीकृष्ण खुद को अजन्मा कहते हैं, तो दूसरी तरफ अपने कई जन्मों की बात करते हैं। साथ ही, वे प्रकृति और पुरुष को भी अनादि बताते हैं। ​वे मुख्य रूप से इन तीन श्लोकों को सामने रखते हैं- ​गीता 4.5 - मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं। (श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं) ​गीता 10.3 - जो मुझे अज (अजन्मा) और अनादि (जिसका कोई आरंभ न हो) जानता है..... ​गीता 13.20 - प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) दोनों को ही तुम अनादि समझो। ​सवाल उठाया जाता है - अगर श्रीकृष्ण के अनेक जन्म हुए, तो वे अजन्मा कैसे हो सकते हैं? और यदि केवल वे ही सर्वोच्च अनादि ईश्वर हैं तो प्रकृति-पुरुष को अनादि क्यों कहा गया?