क्या सचमें मा सरस्वतीजी भगवान ब्रह्माजी की पुत्री हैं?
"सनातनी हिंदू धर्म में कतिपय पुराणों के आख्यानों का शाब्दिक और स्थूल अर्थ निकालकर यह दुष्प्रचार किया जाता है कि ब्रह्माण्ड रचयिता भगवान ब्रह्माजी अपनेही पुत्री सरस्वती पर मोहित होकर उनसे विवाह करते हैं ?"
जब सनातन धर्म के सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथों—श्रुति (वेद एवं उपनिषद्), स्मृति (पुराण एवं आचार संहिता) और विशेष रूप से अद्वैत वेदान्त के अद्वय दर्शन का सूक्ष्म अनुशीलन किया जाता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवती सरस्वती ब्रह्मा जी की कोई लौकिक या जैविक पुत्री नहीं थीं । वे ब्रह्मा जी की अपनी ही अंतर्निहित रचनात्मक शक्ति, उनकी सनातन सहधर्मिणी, उनकी स्त्री और अर्धांगिनी हैं । यह सम्बन्ध पूर्णतः तात्विक, ब्रह्माण्डीय और दार्शनिक है, जिसका लौकिक जैविक संबंधों से कोई साम्य नहीं है ।
Detailed Investigation
देवी सरस्वती के संबंध में सनातनी वैदिक हिंदू धर्मके विभिन्न धर्मग्रंथों में उन्हें भगवान ब्रह्मा जी की शक्ति, पत्नी अथवा सृष्टि-कार्य में सहायक दिव्य शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।इस विमर्श का वास्तविक समाधान केवल श्रुति (वेद और ब्राह्मण ग्रंथ) तथा स्मृति (पुराण, मनुस्मृति आदि) के प्रामाणिक संदर्भों और उनके दार्शनिक रहस्यों के सूक्ष्म विश्लेषण से ही संभव है।यह शोध पत्र विभिन्न वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, धर्मशास्त्रों और विविध पुराणों के प्रमाणों के आधार पर इस विषय की एक निष्पक्ष मीमांसा प्रस्तुत करता है।
श्रुति ग्रंथों में निहित प्रमाण और उनकी दार्शनिक व्याख्या
वैदिक परंपरा अर्थात श्रुति ग्रंथों में भगवान ब्रह्मा को 'प्रजापति' (सृष्टि के स्वामी) के रूप में निरूपित किया गया है और देवी सरस्वती को आदिम 'वाक्' (वाणी) अथवा 'उषा' (प्रातःकाल) के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है।वेदों में इन दोनों के मध्य का संबंध जैविक न होकर पूर्णतः पराभौतिक और खगोलीय सिद्धांतों पर आधारित है।
१.कृष्ण यजुर्वेद की काठक संहिता (१२.५) :-
सृष्टि के प्रारंभ प्रजापति के साथ 'वाक्' (शब्द/कंपन) मौजूद थी, और वह वाक् ही साक्षात् परब्रह्म (सरस्वती जी)है।
मुख्य संदेश:- ये मंत्र इसका प्रमाण दे रहा है जिस प्रकार शिव तथा शक्ति अभिन्न है उसी प्रकार ब्रह्माजी (प्रजापति) और उनकी सरस्वती (वाणी) अभिन्न है।
२.पंचविंश ब्राह्मण (सामवेद) - २०.१४.२:-
अखंड ब्रह्म जब 'बहु' होने की इच्छा करता है, तो वह स्वयं को मन और वाणी में उत्पन्न करके विभिन्न लोकों और रूपों में स्वयं को विभाजित कर देता है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक केवल उस एक ही परमात्मा के विभिन्न स्तर हैं।
मुख्य संदेश:- यहाँ भी ईश्वर और उसकी शक्ति अग्नि ओर उसकी शिखा के भांति एक है ।जिस प्रकार अग्नि की शिखा अग्निसे उत्पन्न तो होती है किंतु दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण रहती है ठीक उसी प्रकार भगवान ब्रह्माजी और उनकी वाणी अभिन्न हैं।
३. जैमिनीयब्राह्मणम्(सामवेद)२.२५२-२५५:- प्रजापति अकेले थे उन लके मन में इच्छा अनेक होनेकी उत्पत्ति हुई उन्होंने अपने वाणी जोकि उनकीही शक्ति स्वरूपा हैं उनके साथ मिलकर कामधेनु जी को उत्पत्ति किया।
मुख्य संदेश:- सृष्टि की रचना के पगपग में भगवान ब्रह्मा को उनकी वाणी ने सहायता किया जोकि उनका ही अभिन्न रूप है।
४.बृहदारण्यक उपनिषद् (१.४.३) :-
वो आदि पुरुष प्रसन्न नहीं थे इसी कारण आज भी कोई मनुष्य अकेला होने पर प्रसन्न नहीं रहता।उन्होंने एक साथी की इच्छा की तब वह इतना विशाल हो गया जितना आलिंगनबद्ध पति और पत्नी का संयुक्त रूप होता है। फिर उसने अपने ही शरीर को दो भागों में विभाजित कर दिया। उन दो भागों से पति और पत्नी उत्पन्न हुए।
मुख्य संदेश : यहाँ स्पष्ट रूप से भगवान ब्रह्मा जी ने स्वयं संसार में व्याप्त करने हेतु स्वयंको दो भाग में विभाजित किया एक परमपुरुष और एक परमप्रकृति जिससे ये संपूर्ण संसार बना।
स्मृति ग्रंथों में निहित प्रमाण और उनकी दार्शनिक व्याख्या
१.मनुस्मृति (१.३२) :-
द्विधा कृत्वाऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।
अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥ ३२ ॥
अर्थात:-अपने शरीर को दो भागों में विभाजित करके, एक भाग से भगवान पुरुष बने और दूसरे भाग से स्त्री; उसी से उन्होंने विराज को उत्पन्न किया।
मुख्य संदेश:- भगवान ब्रह्माजी अपनेही वृहद आकार(परमब्रह्म) दैवीयशरीर को दैवीय रूप से विभाजन(माया से) करके परमपुरुष वे स्वयं और परमप्रकृति शक्तिस्वरूपा सरस्वती देवी(उनकी शक्ति) के रूप में उत्पन्न करके संसार की रचना करते हैं।
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