क्या वास्तव में सनातन वैदिक हिंदू धर्म में अनेक भगवान है?
"सनातन हिंदू धर्म में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। कहीं विष्णु को सर्वोच्च कहा जाता है, कहीं शिव को, तो कहीं शक्ति को। इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तविक ईश्वर कौन है। इस कारण हिंदू धर्म बहुदेववादी प्रतीत होता है और एक परमेश्वर की अवधारणा अस्पष्ट लगती है।"
Detailed Investigation
सनातन वैदिक हिंदू धर्म की बाह्य संरचना को देखने पर बहुदेववाद की प्रतीति होना स्वाभाविक है, जहाँ शिव, नारायण, शक्ति, गणेश और सूर्य जैसी विभिन्न दिव्य सत्ताओं की उपासना स्वतंत्र रूपों में की जाती है। परंतु जब इस परंपरा का सूक्ष्म दार्शनिक तथा शास्त्रीय अन्वेषण किया जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक धर्म का मूल ढांचा पूर्णतः एकेश्वरवादी तथा अद्वैतवादी है। सनातन धर्म में इन विभिन्न देवताओं को पृथक या प्रतिस्पर्धी ईश्वर नहीं माना गया है, बल्कि वे एक ही शाश्वत, निराकार, अनंत और लिंगविहीन परम चेतना—जिसे 'ब्रह्म' या 'परमात्मा' कहा जाता है उनकी विभिन्न व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
धर्म' शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की 'धृ' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है धारण करना या बनाए रखना। यह वह अंतर्निहित नियम है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को एक सूत्र में पिरोये रखता है। वैदिक दर्शन में इस वैश्विक व्यवस्था के मूल कारण को 'सत्' कहा गया है, जो परिवर्तनशील नाम-रूपों के पीछे अवस्थित एकमात्र अपरिवर्तनीय वास्तविकता है। जैसे सागर से उठने वाली तरंगें अंततः सागर का ही रूप होती हैं, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांड की समस्त दृश्य और अदृश्य शक्तियाँ उस एक ही परब्रह्म की तरंगे हैं।
यह शोध पत्र विभिन्न वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, धर्मशास्त्रों और विविध पुराणों के प्रमाणों के आधार पर इस विषय की एक निष्पक्ष मीमांसा प्रस्तुत करता है।
(१)श्रुति ग्रंथों के माध्यम से एकेश्वरवाद का प्रत्यक्ष प्रमाण
श्रुति ग्रंथ, जिनमें मुख्य रूप से चारों वेद और उपनिषद सम्मिलित हैं, हिंदू धर्म के परम प्रमाण माने जाते हैं। इन ग्रंथों में अनेक स्थानों पर स्पष्ट और निर्विवाद रूप से घोषणा की गई है कि परम सत्य केवल एक ही है।
१.१)ऋग्वेद का ऐतिहासिक सिद्धांत
वैदिक वांग्मय में एकेश्वरवाद का सबसे प्रखर और प्राचीन उद्घोष ऋग्वेद के प्रथम मंडल में मिलता है, जहाँ विविध देवताओं के पीछे सक्रिय एक ही मूल तत्व को उद्घाटित किया गया है।
ऋग्वेद (१.१६४.५६) के इस मंत्र के अनुसार,
विद्वान जन उस एक ही 'सत्' (परम सत्ता) को इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य सुपर्ण गरुत्मान, यम और मातरिश्वा जैसे अनेक नामों से पुकारते हैं। सायणाचार्य के भाष्य के अनुसार, यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि विभिन्न कार्यों के कारण परमात्मा के नाम भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं, परंतु उनका मूल आत्मा केवल एक ही है।
१.२)श्वेताश्वतर उपनिषद का सर्वव्यापी देवत्व
श्वेताश्वतर उपनिषद (अध्याय ६, मंत्र ११) में उस परम पुरुष की सर्वव्यापकता और अद्वितीयता को इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है:
वह प्रकाशमान परमात्मा केवल 'एक' ही है, जो समस्त प्राणियों के भीतर अत्यंत सूक्ष्म रूप से छिपा हुआ है। वह सर्वव्यापी है, सभी का अंतर्यामी है, सभी कर्मों का अध्यक्ष और समस्त भूतों का निवास स्थान है। वह चेतना स्वरूप, साक्षी और माया के तीनों गुणों से सर्वथा परे (निर्गुण) है।
१.३)ईशावास्य उपनिषद और ईश्वर की अखंडता
शुक्ल यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय के रूप में संकलित ईशावास्य उपनिषद का प्रथम मंत्र ही संसार के कण-कण में एक ही ईश्वर की उपस्थिति को रेखांकित करता है:
इस गतिशील ब्रह्मांड में जो कुछ भी जड़ या चेतन अस्तित्व है, वह सब उस एकमात्र ईश्वर द्वारा ही आच्छादित और संचालित है। इसी उपनिषद के चतुर्थ मंत्र में ईश्वर को "अनेजदेकं मनसो जवीयो..." कहकर संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है कि वह परम सत्य कंपन से रहित, सर्वथा स्थिर और केवल 'एक' है, जो मन से भी अधिक तीव्र गति वाला है।
१.४)यजुर्वेद का अमूर्त सिद्धांत
यजुर्वेद (३२.३) मंत्र मूर्ति पूजा के सूक्ष्म रहस्य और निराकार सत्ता को प्रकट करता है:
उस निराकार परमात्मा की कोई 'प्रतिमा' (भौतिक सादृश्य, चित्र या सीमाबद्ध आकृति) नहीं बनाई जा सकती, क्योंकि उसका नाम और यश अत्यंत महान है। वह अजन्मा है और हिरण्यगर्भ रूप में संपूर्ण सृष्टि का आदि कारण है। यद्यपि कालांतर में भक्तों की मानसिक एकाग्रता के लिए मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करके उन्हें उपासना का माध्यम बनाया गया, परंतु दार्शनिक स्तर पर वे सभी प्रतीक उसी एक असीम सत्ता की ओर संकेत करते हैं।
१.५)पंचदेवों की तादात्म्यता और ब्रह्म में उनका एकीकरण
सनातन परंपरा में शिव, शक्ति, गणेश, नारायण (विष्णु) और सूर्य को पंचदेव माना गया है। आधुनिक काल में कई लोग इन्हें भिन्न-भिन्न ईश्वर मानकर भ्रमित होते हैं, परंतु श्रुति ग्रंथों के विशिष्ट अंगों (अथर्वशीर्ष और उपनिषदों) के गंभीर अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि प्रत्येक देव-स्वरूप को सीधे उसी अद्वितीय ब्रह्म का ही रूप स्वीकार किया गया है।
१.६)गणेश के रूप में परब्रह्म
अथर्ववेदीय परंपरा के प्रसिद्ध 'गणपति अथर्वशीर्ष' (गणपत्युपनिषद) के प्रारंभ में ही भगवान गणेश को सृष्टि का आदि और अंत मानते हुए सीधे परब्रह्म घोषित किया गया है:
हे गणपति! आपको नमस्कार है; आप ही प्रत्यक्ष परम तत्व हैं। आप ही इस सृष्टि के एकमात्र कर्ता, धर्ता और संहर्ता हैं, और आप ही वास्तव में साक्षात ब्रह्म हैं। यह प्रमाण दर्शाता है कि गणेश कोई पृथक लोक-देवता नहीं बल्कि स्वयं सृष्टि के संचालक ब्रह्म हैं।
१.७)सूर्य के रूप में चिद्-ब्रह्म
'सूर्योपनिषद' (सूर्याथर्वशीर्ष) में सूर्य को भौतिक पिंड से परे ब्रह्मांड की आत्मा और तीनों देवों का एकीकृत रूप माना गया है:
सूर्य ही इस जड़-चेतन जगत की अंतरात्मा है और उन्हीं से समस्त जीवों की उत्पत्ति होती है। सूर्य ही प्रत्यक्ष रूप से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। इस प्रकार सूर्य की उपासना भी उसी एक परम ब्रह्म की उपासना है।
१.८)शिव और विष्णु (नारायण) की पूर्ण अभेदता
शैव और वैष्णव संप्रदायों के कृत्रिम भेदों को मिटाते हुए कृष्ण यजुर्वेद की 'स्कन्दोपनिषद' दोनों महाशक्तियों को एक ही सिक्के के दो पहलू सिद्ध करती है:
विष्णु रूप शिव और शिव रूप विष्णु को बारंबार नमन है। शिव का हृदय वास्तव में विष्णु हैं और विष्णु का हृदय स्वयं शिव हैं। जिस प्रकार विष्णु शिवमय हैं, उसी प्रकार शिव भी विष्णुमय हैं; जो साधक इन दोनों में कोई अंतर नहीं देखता, वही जीवन में कल्याण और दीर्घायु प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद में भी रुद्र (शिव) को हृदय में वास करने वाला अत्यंत कल्याणकारी और सर्वशक्तिमान देव माना गया है।
१.९)शक्ति का कारण-कार्य स्वरूप
शक्ति को चेतना की क्रियात्मक अवस्था माना गया है। महाकवि गणपति मुनि द्वारा रचित 'उमासहस्रम्' में शक्ति की अद्वैत स्थिति को स्पष्ट किया गया है:
विद्वानों का मत है कि कारण और कार्य के विभाग से उस आद्यशक्ति देवी के दो स्वरूप हैं; एक रूप सृष्टि के भरण-पोषण के लिए है और दूसरा स्वयं की आनंदमयी क्रीड़ा (लीला) के लिए है। इस प्रकार शक्ति भी ब्रह्म की ही प्राणमयी ऊर्जा है, जो सृष्टि का आधार है।
(२)स्मृति ग्रंथों का साक्ष्य और भगवद्गीता की व्याख्या
महाभारत के भीष्म पर्व का अंग रही श्रीमद्भगवद्गीता सनातन धर्म की सर्वमान्य आचार संहिता और स्मृति ग्रंथ है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेशों के माध्यम से बहुदेववाद के भ्रम को समूल नष्ट कर दिया है और स्पष्ट किया है कि केवल एक ही परमेश्वर पूजनीय है।
१.१)अनन्य भक्ति और अन्य देवताओं की पूजा का रहस्य
भगवद्गीता के नवम अध्याय के २३वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने विभिन्न रूपों की पूजा करने वाले साधकों के अंतिम गंतव्य का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण किया है:
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो भी मनुष्य अत्यंत श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं (जैसे इंद्र, सूर्य आदि) की पूजा करते हैं, वे भी अनजाने में केवल मेरी (उस एक ही परमात्मा की) ही पूजा कर रहे होते हैं, परंतु उनकी वह पूजा 'अविधिपूर्वक' (अर्थात् अज्ञानता व आंशिक समझ के कारण) होती है।
१.२)श्रद्धा का सुदृढ़ीकरण और परम गंतव्य
गीता के सप्तम अध्याय में यह निरूपित किया गया है कि मनुष्य अपनी वासनाओं के वशीभूत होकर विभिन्न देवताओं की शरण में जाता है, परंतु उन देवताओं के माध्यम से फल देने वाला और उनकी श्रद्धा को सुदृढ़ करने वाला भी वह एक ही परमेश्वर है:
भगवान घोषणा करते हैं कि जो-जो भक्त जिस-जिस देव-स्वरूप की पूजा करने की इच्छा रखता है, उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति अडिग कर देता हूँ, क्योंकि अंततः वे सभी रूप मेरी ही विभूतियाँ हैं।
(३)दार्शनिक मीमांसा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
सनातन धर्म के एकेश्वरवाद को समझने के लिए एक विशेष दार्शनिक परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता है। यह एकेश्वरवाद पाश्चात्य या सामी मतों की भाँति संकुचित नहीं है जो अन्य देवताओं को मिथ्या या शत्रुवत मानते हैं। इसके विपरीत, सनातन परंपरा का एकेश्वरवाद 'सर्वसमावेशी' है, जो यह मानता है कि चराचर जगत की प्रत्येक दिव्य अभिव्यक्ति उसी एक ऊर्जा का प्रकटीकरण है।
(४)चेतना का भौतिकी से संबंध
आधुनिक भौतिक विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में यदि विचार किया जाए, तो परब्रह्म की अवधारणा को 'एकीकृत क्षेत्र' (Unified Field) के समान माना जा सकता है। जिस प्रकार संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त विद्युत ऊर्जा एक ही है, परंतु जब वह पंखे, हीटर, या बल्ब के माध्यम से प्रवाहित होती है, तो उसके कार्य (हवा देना, गर्मी देना, प्रकाश देना) भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं; ठीक उसी प्रकार वह परम चेतना (ब्रह्म) जब विभिन्न शक्तियों के माध्यम से क्रियाशील होती है, तो उसे शिव, शक्ति, गणेश, नारायण या सूर्य कहा जाता है।
(५)मानवीय चेतना और साकार उपासना की आवश्यकता
मनुष्य अपने भौतिक शरीर और सीमित बुद्धि के बंधनों के कारण सीधे निराकार और निर्गुण ब्रह्म की कल्पना नहीं कर पाता। इसलिए शास्त्रों ने मन की एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार की यात्रा को सुगम बनाने के लिए सगुण साकार रूप (मूर्तियों और विशिष्ट देवताओं) की उपासना का विधान किया है। आदि शंकराचार्य का रस्सी और सर्प का प्रसिद्ध उदाहरण (रज्जु-सर्प न्याय) यहाँ प्रासंगिक है, जो यह दर्शाता है कि अज्ञानता के कारण जो रस्सी सर्प जैसी प्रतीत होती है, ज्ञान होने पर वह पुनः रस्सी ही सिद्ध होती है। इसी प्रकार, जब तक पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता, तब तक साधक शिव या नारायण को अलग मानता है, परंतु आत्मज्ञान होने पर उसे केवल एक ही अद्वितीय परब्रह्म दिखाई देता है।
निष्कर्ष
समग्र शास्त्रीय और दार्शनिक अन्वेषण से यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि सनातन वैदिक हिंदू धर्म में कोई आंतरिक बहुदेववाद नहीं है, बल्कि यह एक ही निराकार और सर्वव्यापी ईश्वर (परब्रह्म) की बहुआयामी उपासना पद्धति है। शिव, शक्ति, गणेश, नारायण और सूर्य में से कोई भी एक-दूसरे से छोटा, बड़ा या पृथक नहीं है। वे सभी उस एक ही अद्वितीय परमात्मा के विभिन्न व्यावहारिक स्वरूप हैं, जिन्हें ऋषियों ने साधकों की भिन्न-भिन्न मानसिक रुचियों और क्षमताओं के अनुसार प्रकट किया था।
अत: यह मान लेना कि हिंदू धर्म में ईश्वर को लेकर कोई आपसी मतभेद या विभाजन है, शास्त्रों की सतही समझ का परिणाम है। श्रुति ग्रंथों की सर्वोपरि उद्घोषणा और स्मृति ग्रंथों की व्यावहारिक सीख यही है कि संपूर्ण जगत का नियंता केवल एक ही परमेश्वर है, और चराचर जगत में दिखाई देने वाली विविधता केवल उसी एक शाश्वत सत्य की रश्मियाँ हैं।
Reader Reflections 0
Join the conversation to share your insights.
Sign In to Reflect