शौर्य, स्वाभिमान और धर्मरक्षक: महापराक्रमी महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप जी ने किसी विधर्मी के सामने शीश नहीं झुकाया। वो जानते थे कि मुग़ल आक्रान्ता अकबर के सामने झुकने का अर्थ केवल राजनीतिक पराजय नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म का पतन था।
गर्वित भारतीय हिन्दू...!
महाराणा प्रताप जी ने किसी विधर्मी के सामने शीश नहीं झुकाया। वो जानते थे कि मुग़ल आक्रान्ता अकबर के सामने झुकने का अर्थ केवल राजनीतिक पराजय नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म का पतन था।
आइए इस पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं : - वेदों में 'त्रयस्त्रिंशत् कोटि' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है :- हिन्दू सनातन धर्म के प्रमाणिक पौराणिक अभिलेखों जैसे वेद, जिनमें अथर्ववेद, ऋग्वेद और यजुर्वेद, उपनिषद जैसे बृहदारण्यक उपनिषद में कहीं पर भी 'त्रयस्त्रिंशत् कोटि' शब्द का प्रयोग ही नहीं हुआ है। इन मूल ग्रंथों में केवल "त्रयस्त्रिंशत् देवा: अर्थात तैंतीस देवता या "त्रयस्त्रिंशत् अर्थात 33" शब्द का ही प्रयोग हुआ है। महर्षि याज्ञवल्क्य भी जब गिनती कराते हैं, तो वे 8 (वसु) + 11 (रूद्र) + 12 (आदित्य) + 2 (इंद्रा तथा प्रजापति) करके स्पष्ट रूप से संख्या 33 देवता ही बताते हैं। उन्होंने कहीं भी "तैंतीस कोटि" नहीं कहा है। फिर 'तैंतीस कोटि' शब्द कहाँ से आया? वेदों (श्रुति) के बाद जब हजारों सालों बाद पुराणों और स्मृतियों (स्मृति ग्रंथों) का काल आया, तब साहित्य की भाषा में बदलाव आया। => पौराणिक अतिशयोक्ति (Exaggeration) के रूप में कई पुराणों, स्तोत्रों और महाकाव्यों में ईश्वर की महिमा और ब्रह्मांड की विशालता को दर्शाने के लिए काव्यात्मक अतिशयोक्ति का सहारा लिया गया। उदाहरण के लिए, कुछ पुराणों जैसे स्कंद पुराण में शिव के गणों, योगिनियों और देवों की संख्या करोड़ों में बताई गई है, यद्यपि यह पूर्ण रूप से देव महिमा हेतु की गई काव्यात्मक अभिव्यक्ति थी। => आम जनमानस की भाषा : - समय के साथ-साथ, जब वैदिक तैंतीस देवताओं की अवधारणा लोक-कथाओं में पहुंची, तो 'कोटि' (जिसका मूल अर्थ यहाँ श्रेणी था) शब्द इसके साथ जुड़ गया। बाद में क्षेत्रीय भाषाओं और विदेशी अनुवादकों ने 'कोटि' शब्द का सीधा गणितीय अनुवाद 'करोड़' कर दिया। वास्तव में 'तैंतीस कोटि' (प्रकार/श्रेणी) देवता कोई मानव रूपी व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि हमारे ब्रह्मांड को चलाने वाली प्राकृतिक शक्तियों (Natural Forces), तत्वों (Elements), और समय (Time) का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक वर्गीकरण है। आजकल विद्वान जो यह तर्क देते हैं कि "33 कोटि का अर्थ 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 प्रकार है," वह भावना और वैदिक दर्शन के स्तर पर बिल्कुल सही है। यह लोगों को 33 करोड़ के अंधविश्वास से बाहर निकालने का एक तार्किक तरीका है। लेकिन तथ्यात्मक (Factually) रूप से यदि बात करें तो वेदों में कहीं भी 'तैंतीस कोटि' शब्द वर्णित ही नहीं है। वेदों में सिर्फ कहा गया है कि 'तैंतीस देवता' है। इसलिए, "वेदों में कोटि का अर्थ प्रकार अथवा श्रेणी है" यह कहना तकनीकी रूप से गलत है, क्योंकि वेदों में देवताओं की संख्या के साथ 'कोटि' शब्द जोड़ा ही नहीं गया था। यह शब्द केवल बाद के साहित्य की देन है।
हमारा - आपका काम है हर रोज़ जाकर अपनी चाबी लगाना... मतलब अपना काम करना। क्या पता ऊपर बैठा 'बड़ा बाबू' किस दिन हमारे वाले लाकर की अपनी 'किस्मत' वाली चाबी लाकर में लगा दे और हमारा भाग्य चमक जाए...?