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तैंतीस करोड़ देवी - देवता

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तैंतीस करोड़ देवी - देवता - HinduText Fact Check
? The Common Claim

"कुछ विधर्मियों तथा सनातन विरोधियों द्वारा सनातन धर्म पर यह लांछन लगाया जाता है कि इनके धर्म में तो देवी - देवता ही 33 करोड़ हैं, फिर उनके मंदिर, नाम और पूजा पद्धति क्या-क्या है, इन्हें खुद नहीं पता...! चलिए आज इस तथ्य की सत्यता और अस्पष्टता से पर्दा हटाते हैं।"

The Actual Truth

आम तौर पर इंटरनेट और सामान्य व्यवहार चर्चाओं में यह कुतर्क दिया जाता है कि हिन्दू सनातन धर्म के पौराणिक अभिलेखों, जिनमें वेद, पुराण तथा उपनिषद् आदि सम्मिलित हैं, में 'तैंतीस कोटि' शब्द लिखा गया है। तथा बिना कोई गहन खोजबीन और भाषा सम्बन्धी समानार्थी शब्दों का अध्यन किए वह लोग इस शब्द के 'कोटि' भाग कर अर्थ "करोड़" निकालकर अपने कुतर्क को दावे का नाम देकर बहस करने लगते हैं। 

जबकि कुछ लोग, जो थोड़ा-बहुत भाषा का ज्ञान तथा हिन्दू धर्म के प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं, वह इसी वाक्य के इसी 'कोटि' शब्द का अर्थ "प्रकार" बताकर अपने धर्म तथा देवी-देवताओं के प्रति फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का खण्डन करते हैं।

"यद्यपि खण्डन करने वालों का कुतर्क करने वालों को दिया गया स्पष्टीकरण पूर्णतया सही है किन्तु यहाँ एक बात ऐसी है जिसके बारे में पता होना सभी के लिए अनिवार्य है - "मूल सनातन पौराणिक अभिलेखों में कहीं भी किसी भी रूप में 'तैंतीस कोटि' शब्द एक साथ प्रयोग ही नहीं हुआ है।"

Detailed Investigation

आइए इस पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं : -

  • वेदों में 'त्रयस्त्रिंशत् कोटि' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है :-

हिन्दू सनातन धर्म के प्रमाणिक पौराणिक अभिलेखों जैसे वेद, जिनमें अथर्ववेद, ऋग्वेद और यजुर्वेद, उपनिषद जैसे बृहदारण्यक उपनिषद में कहीं पर भी 'त्रयस्त्रिंशत् कोटि' शब्द का प्रयोग ही नहीं हुआ है। इन मूल ग्रंथों में केवल "त्रयस्त्रिंशत् देवा: अर्थात तैंतीस देवता या "त्रयस्त्रिंशत् अर्थात 33" शब्द का ही प्रयोग हुआ है। महर्षि याज्ञवल्क्य भी जब गिनती कराते हैं, तो वे 8 (वसु) + 11 (रूद्र) + 12 (आदित्य) + 2 (इंद्रा तथा प्रजापति) करके स्पष्ट रूप से संख्या 33 देवता ही बताते हैं। उन्होंने कहीं भी "तैंतीस कोटि" नहीं कहा है।

  • फिर 'तैंतीस कोटि' शब्द कहाँ से आया?

वेदों (श्रुति) के बाद जब हजारों सालों बाद पुराणों और स्मृतियों (स्मृति ग्रंथों) का काल आया, तब साहित्य की भाषा में बदलाव आया।

=> पौराणिक अतिशयोक्ति (Exaggeration) के रूप में कई पुराणों, स्तोत्रों और महाकाव्यों में ईश्वर की महिमा और ब्रह्मांड की विशालता को दर्शाने के लिए काव्यात्मक अतिशयोक्ति का सहारा लिया गया। उदाहरण के लिए, कुछ पुराणों जैसे स्कंद पुराण में शिव के गणों, योगिनियों और देवों की संख्या करोड़ों में बताई गई है, यद्यपि यह पूर्ण रूप से देव महिमा हेतु की गई काव्यात्मक अभिव्यक्ति थी।

=> आम जनमानस की भाषा : - समय के साथ-साथ, जब वैदिक तैंतीस देवताओं की अवधारणा लोक-कथाओं में पहुंची, तो 'कोटि' (जिसका मूल अर्थ यहाँ श्रेणी था) शब्द इसके साथ जुड़ गया। बाद में क्षेत्रीय भाषाओं और विदेशी अनुवादकों ने 'कोटि' शब्द का सीधा गणितीय अनुवाद 'करोड़' कर दिया।

वास्तव में 'तैंतीस कोटि' (प्रकार/श्रेणी) देवता कोई मानव रूपी व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि हमारे ब्रह्मांड को चलाने वाली प्राकृतिक शक्तियों (Natural Forces), तत्वों (Elements), और समय (Time) का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक वर्गीकरण है। आजकल विद्वान जो यह तर्क देते हैं कि "33 कोटि का अर्थ 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 प्रकार है," वह भावना और वैदिक दर्शन के स्तर पर बिल्कुल सही है। यह लोगों को 33 करोड़ के अंधविश्वास से बाहर निकालने का एक तार्किक तरीका है।

लेकिन तथ्यात्मक (Factually) रूप से यदि बात करें तो वेदों में कहीं भी 'तैंतीस कोटि' शब्द वर्णित ही नहीं है। वेदों में सिर्फ कहा गया है कि 'तैंतीस देवता' है। इसलिए, "वेदों में कोटि का अर्थ प्रकार अथवा श्रेणी है" यह कहना तकनीकी रूप से गलत है, क्योंकि वेदों में देवताओं की संख्या के साथ 'कोटि' शब्द जोड़ा ही नहीं गया था। यह शब्द केवल बाद के साहित्य की देन है।

Sources & References

1. अथर्ववेद (कांड 10, सूक्त 7, मंत्र 13)

अथर्ववेद के इस मंत्र में परमेश्वर (स्कम्भ/ब्रह्म) के भीतर तैंतीस देवताओं के समाहित होने की बात कही गई है : -

यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे सर्वे समाहिताः। स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥

अर्थ: हे विद्वान! जिस सर्वाधार (सबको धारण करने वाले) परमात्मा के अंगों में तैंतीस देवता समाहित हैं, उस 'स्कम्भ' (परमेश्वर/ब्रह्म) के विषय में बताओ, वह कौन है?

(यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि ये 33 देवता उसी एक परमेश्वर की विभूतियाँ या अंग हैं।)

2. ऋग्वेद (मंडल 1, सूक्त 45, मंत्र 2)

ऋग्वेद में अग्नि देव का आह्वान करते हुए तैंतीस देवताओं का स्पष्ट वर्णन आता है : -

श्रुष्टीवानो हि दाशुषे देवा अग्ने विचेतसः। तान् रोहिदश्व गिर्वणस्त्रयस्त्रिंशतमा वह॥

अर्थ: हे अग्निदेव! आप लाल घोड़ों वाले (ऊर्जा के प्रतीक) और स्तुति के योग्य हैं। आप उन तैंतीस देवताओं को यहाँ (यज्ञ में) लाएँ जो बुद्धिमान हैं और यज्ञ करने वालों का कल्याण करते हैं।

3. यजुर्वेद (अध्याय 14, मंत्र 31)

यजुर्वेद में भी तैंतीस देवताओं की स्तुति की गई है : -

त्रयस्त्रिंशता स्तुवत भूतान्यशाम्यन् प्रजापतिः परमेष्ठ्याधिपतिरासीत्॥

अर्थ: इन तैंतीस देवताओं के द्वारा स्तुति किए जाने पर सभी प्राणी शांति प्राप्त करते हैं और सबसे ऊपर विराजमान प्रजापति इन सबके अधिपति (स्वामी) हैं।

4. शतपथ ब्राह्मण / बृहदारण्यक उपनिषद (अध्याय 3, ब्राह्मण 9)

यह सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत संदर्भ है, जहाँ महर्षि याज्ञवल्क्य और शाकल्य के बीच संवाद होता है। शतपथ ब्राह्मण के 14वें काण्ड को ही बृहदारण्यक उपनिषद कहा जाता है। इसमें गिनती करके बताया गया है कि ये तैंतीस देवता कौन हैं : -

स होवाच महिमान एवैषामेते, त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति। कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्य्? अष्टौ वसवः, एकादश रुद्राः, द्वादशादित्याः, त एकत्रिंशत्, इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति।

अर्थ: शाकल्य ने पूछा: "वास्तव में देवता कितने हैं?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया: "वास्तव में मुख्य देवता तैंतीस ही हैं।" शाकल्य ने फिर पूछा : - "वे तैंतीस कौन से हैं?" याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट किया: "आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य तथा इनके साथ इंद्र और प्रजापति को मिलाने पर ये तैंतीस होते हैं।"

इन प्राचीन वैदिक प्रमाणों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि मूल सनातन ग्रंथों में देवताओं संख्या केवल तैंतीस (त्रयस्त्रिंशत्) ही बताई गई है, और "तैंतीस करोड़" का विचार केवल भाषिक अपभ्रंश और गलत व्याख्या की उपज ही है।

महर्षि शाकल्य अत्यंत विद्वान वैदिक ऋषि, व्याकरण विशेषज्ञ तथा दार्शनिक थे। 'ऋग्वेद का पदपाठ' तैयार करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। राजा जनक की महा-शास्त्रार्थ सभा में ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ में उनको हराने की मंशा से अपनी सीमा से बाहर जाकर व्यवहार करने पर उन्हें ऋषि याज्ञवल्क्य के श्राप के कारण मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा।

lekhraj thakur
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गर्वित भारतीय हिन्दू...!

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Comments & Discussion 12

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pradeep HS
3 weeks ago
शास्त्रों के मूल प्रमाणों के साथ की गई व्याख्या ही सर्वोपरि है। बहुत-बहुत धन्यवाद।
Rajendra Prasad
Rajendra Prasad This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 266
3 weeks ago
Great writeup. Would love to see a follow-up article delving deeper into the historical chronology.
Shashi Kant
Shashi Kant This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 96
1 month ago
बहुत सुंदर और ज्ञानवर्धक लेख। हर सनातनी को यह अवश्य पढ़ना चाहिए।
Vipin Pathak
1 month ago
Totally agree with this perspective. The historical distortions need to be corrected through such research.
Ishaan Sengupta
1 month ago
अद्भुत व्याख्या! इस विषय पर समाज में बहुत भ्रम फैला हुआ था।
Joker Jam
1 month ago
Finally someone addresses this with logic and scriptural rigor instead of blind dogma.
A
A 2
1 month ago
यह बहुत ही स्पष्ट और विचारणीय विश्लेषण है। बहुत से भ्रांतियों का निवारण हुआ।
Vinay Joshi
Vinay Joshi This is a Sanatani verified by HinduText.in owner 185
1 month ago
ऋग्वेद और उपनिषदों के संदर्भों से सब स्पष्ट हो जाता है। उत्तम प्रयास।