कर्म और किस्मत
हमारा - आपका काम है हर रोज़ जाकर अपनी चाबी लगाना... मतलब अपना काम करना। क्या पता ऊपर बैठा 'बड़ा बाबू' किस दिन हमारे वाले लाकर की अपनी 'किस्मत' वाली चाबी लाकर में लगा दे और हमारा भाग्य चमक जाए...?
कुछ समय पहले की बात है... मैं कौसानी (उत्तराखण्ड) में अपने चाचा जी के यहाँ मेहमान गया था। एक शाम हम लोग बरामदे में बैठे थे तो चाचा जी की फरमाइश पर चाची जी गर्मागर्म चाय लेकर आ गईं। बैंक की नौकरी से रिटायर चाचाजी ने उस दिन उनकी पुरानी यादों का पिटारा खोला और उनके यादों के पिटारे के केंद्र में थे एक चाट की रेहड़ी लगाने वाले भैया, जिनका नाम था लल्लन। 
आगे की कहानी, चाचा जी की ज़ुबानी ही लिख रहा हूँ : -
"बेटा, ये बात शायद 1977-78 या 1978-79 के आस-पास की रही होगी। मेरा तबादला लखनऊ से 100-125 किलोमीटर दूर एक छोटे से शहर की ब्रांच में हुआ था। शहर में घंटाघर के पास एक संकरी-सी गली मुड़ती थी। वहीं नुक्कड़ पर शाम ढलते ही पेट्रोमैक्स (गैस वाली बत्ती) की पीली रोशनी में 'लल्लन भैया' का चाट का ठेला लगता था।
लल्लन के हाथ की आलू-टिक्की और बताशों (पानी-पूरी) का स्वाद तो गज़ब था ही, लेकिन उसकी एक और ख़ासियत थी - उसकी बातें। तुम जब भी उसके ठेले पर जाओ, ऐसा लगता था जैसे वो सुबह से बस तुम्हीं को ढूँढ रहा था बात करने के लिए। राजनीति हो, सिनेमा हो या दुनियादारी, हर विषय पर लल्लन का अपना एक अलग दृष्टिकोण होता था। कई बार तो दफ़्तर से लौटते हुए मैं झल्ला जाता था। मैं कहता - 'अरे लल्लन यार, जल्दी से एक प्लेट चाट लगा दे, घर जाने में देर हो रही है!'
...पर लल्लन कहाँ मानने वाला? जब तक वो अपनी पूरी बात खत्म न कर ले, उसके हाथ रुक-रुक कर ही चलते थे।
एक बार दिसंबर की एक सर्द शाम को मैं अपनी एच.एम.टी. (HMT) घड़ी में बार-बार समय देख रहा था और लल्लन अपनी धुन में 'किस्मत और कर्म' पर प्रवचन दे रहा था। मुझे थोड़ी झुंझलाहट हुई तो मैंने सोचा, चलो आज इस ठेले वाले की फ़िलॉसफ़ी का टेस्ट ले ही लेते हैं।
मैंने उसे टोकते हुए पूछा— 'अच्छा लल्लन भाई, ये बताओ कि आदमी अपनी मेहनत से आगे बढ़ता है या फिर भाग्य से?'
लल्लन ने टिक्की तवे पर पलटी, कंधे पर रखे गमछे से अपने हाथ पोंछे और मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखकर बोला - 'बाबू जी, एक बात बताइए... चौराहे वाले बड़े बैंक की जो ब्रांच है, वहां आपका कोई लाकर (लॉकर) है...?'
मैं थोड़ा चौंका कि एक चाट वाला सीधे बैंक के लॉकर पर कैसे आ गया? हालांकि ब्रांच में मेरा कोई लॉकर-वॉकर नहीं था पर उसके जवाब पर अगली प्रतिक्रिया की उत्सुकता में मैंने कहा - 'हाँ, है तो... पर उसका इस बात से क्या लेना-देना?'
लल्लन ने तवे की आँच धीमी की और बोला - 'बाबू जी, उस लाकर की चाबियों में ही आपके इस सवाल का जवाब छिपा है। इस पर मैंने कहा - 'वो कैसे..?' तो लल्लन ने जवाब दिया - 'आप तो जानते हैं कि बैंक के हर लाकर की दो चाबियाँ होती हैं। एक आपके पास रहती है और दूसरी बैंक के बाबू (मैनेजर) के पास। अब, आपके पास जो चाभी है, वो है आपका 'कर्म', और बड़े बाबू के पास जो चाभी है, वो है आपकी 'किस्मत'।
जब तक दोनों चाबियाँ एक साथ नहीं लगेगी, लाकर का भारी-भरकम ताला नहीं खुलता। मैं, आप और बाकि सब लोग, इस दुनिया में कर्मयोगी हैं और वो जो ऊपर बैठे हैं भगवान जी, वो 'बड़े बाबू' हैं। हमारा - आपका काम है हर रोज़ जाकर अपनी चाबी लगाना... मतलब अपना काम करना। क्या पता ऊपर बैठा 'बड़ा बाबू' किस दिन हमारे वाले लाकर की अपनी 'किस्मत' वाली चाबी लाकर में लगा दे और हमारा भाग्य चमक जाए...? कहीं ऐसा न हो कि भगवान जी अपनी किस्मत वाली चाबी लगा रहें हों, और हम अपनी कर्म वाली चाबी लगाना ही छोड़ दें... और वो ताला खुलने से रह जाए...?'
इतना कहने के बाद चाचा जी चुप हो गए और वहां सिर्फ ठण्डी हवाओं और रात में अपने आशियाने की ओर रुख करते पंछियों के चहचहाने की आवाज़ें रह गईं। उस मामूली से चाट वाले ने एक गहरी और गंभीर बात को कितनी आसानी से कह दिया।
"फिर मैंने सोचा कि आज की पीढ़ी के हम लोग ज़रा सी असफलता मिलने पर अपनी किस्मत को कोसते हुए हार मानकर बैठ जाते हैं। लेकिन सच यही है कि हमें अपना कर्म करते रहना चाहिए। लल्लन के शब्दों में कहूँ तो हमें अपनी कर्म (मेहनत) की चाबी घुमाते रहना चाहिए, क्योंकि क्या पता भगवान जी किस्मत की चाबी लगाए हुए हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे हों...!"
आप लोगों का इस बारे में क्या सोचना है? क्या आपने भी कभी किसी अनजान शख्स से ज़िंदगी का कोई बड़ा सबक सीखा है? कमेंट्स में ज़रूर बताएँ।
*(सभी चित्र प्रतीकात्मक तथा ए.आई. द्वारा सृजित हैं।)
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Sign In to ReflectVipin Kumar
3 weeks agoVipin Kumar
3 weeks ago