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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 110 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 110 • ऋचा / मन्त्र 2

10.110.2

Mantra ID: 10.110.2

तनू॑नपात्प॒थ ऋ॒तस्य॒ याना॒न्मध्वा॑ सम॒ञ्जन्स्व॑दया सुजिह्व । मन्मा॑नि धी॒भिरु॒त य॒ज्ञमृ॒न्धन्दे॑व॒त्रा च॑ कृणुह्यध्व॒रं नः॑ ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.110.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! यज्ञ के जो मार्ग अर्थात्‌ हवि हैं, उन्हें मधु से मिलाकर अपनी शोभन-ज्वाला रूपी जीभ से उनका स्वाद लो. तुम सुंदर भावों द्वारा हमारी स्तुतियों और यज्ञ को उन्नत बनाओ एवं हमारे यज्ञ को देवों के भाग के योग्य बनाओ. (२)

EN English Translation

O agni! Mix the paths of yajna i.e. havi with honey and taste them with your beaut-flame-like tongue. You upgrade our praises and yajna by beautiful emotions and make our yajna worthy of the part of the gods. (2)

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