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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 114 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 114 • ऋचा / मन्त्र 5

10.114.5

Mantra ID: 10.114.5

सु॒प॒र्णं विप्राः॑ क॒वयो॒ वचो॑भि॒रेकं॒ सन्तं॑ बहु॒धा क॑ल्पयन्ति । छन्दां॑सि च॒ दध॑तो अध्व॒रेषु॒ ग्रहा॒न्सोम॑स्य मिमते॒ द्वाद॑श ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.114.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

क्रांतदर्शी विद्वान्‌ परमात्मारूपी एक ही पक्षी को अनेक प्रकार के वचनों से वर्णित करते हैं. वे यज्ञों में भांति-भांति के छंदों की रचना करते हैं तथा सोमरस के बारह पात्रों को स्थापित करते हैं. (५)

EN English Translation

The kratandarsophys describe the same bird as divine with a variety of words. They compose a variety of verses in the yagnas and establish the twelve characters of the Somras. (5)

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