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10.115.3
तं वो॒ विं न द्रु॒षदं॑ दे॒वमन्ध॑स॒ इन्दुं॒ प्रोथ॑न्तं प्र॒वप॑न्तमर्ण॒वम् । आ॒सा वह्निं॒ न शो॒चिषा॑ विर॒प्शिनं॒ महि॑व्रतं॒ न स॒रज॑न्त॒मध्व॑नः ॥ (३)
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ऋग्वेद मन्त्र 10.115.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
पक्षी के समान वृक्षनिर्मित अरणि का आश्रय लेने वाले, अन्न देने वाले, दीप्तिशाली, शब्दकर्त्ता, वनों के अत्यधिक दाहक, अतिशय हव्यवाहक, बैल के समान हव्य-वहन करने वाले अपने प्रकाश से महान् व सूर्य के समान मार्ग का निर्माण करने वाले अग्नि की स्तुति करो. (३)
EN English Translation
Praise the agni that takes shelter of a tree-like forest like a bird, the giver of food, the radiant, the word-maker, the most burning of the forests, the very lustful, the bull-like energy, who creates the path like the great sun with its light. (3)