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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 132 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 132 • ऋचा / मन्त्र 3

10.132.3

Mantra ID: 10.132.3

अधा॑ चि॒न्नु यद्दिधि॑षामहे वाम॒भि प्रि॒यं रेक्णः॒ पत्य॑मानाः । द॒द्वाँ वा॒ यत्पुष्य॑ति॒ रेक्णः॒ सम्वा॑र॒न्नकि॑रस्य म॒घानि॑ ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.132.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मित्रवरुण! जिस समय हम तुम्हारे लिए हव्य धारण करने की इच्छा करते हैं, उसी समय हम प्रिय धन के पास पहुंच जाते हैं. तुम्हें हव्य देने वाला जो धन प्राप्त करता है, उसको कोई भी नष्ट नहीं कर सकता. (३)

EN English Translation

Oh my friend! At the time when we desire to hold on to you, at the same time we come to dear wealth. No one can destroy the money that gives you the money. (3)

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