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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 35 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 35 • ऋचा / मन्त्र 2

10.35.2

Mantra ID: 10.35.2

दि॒वस्पृ॑थि॒व्योरव॒ आ वृ॑णीमहे मा॒तॄन्सिन्धू॒न्पर्व॑ताञ्छर्य॒णाव॑तः । अ॒ना॒गा॒स्त्वं सूर्य॑मु॒षास॑मीमहे भ॒द्रं सोमः॑ सुवा॒नो अ॒द्या कृ॑णोतु नः ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.35.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हम द्यावा-पृथिवी से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. मैं माता तुल्य नदियों एवं कुरुक्षेत्र में स्थित पर्वतों से भी रक्षा की याचना करता हूं. हे सूर्य एवं उषा! मैं तुम दोनों से प्रार्थना करता हूं कि मुझे पापरहित रखो. जाने जाते हुए सोम आज हमारा मंगल करें. (२)

EN English Translation

We pray to Dyava-Prithvivi for our protection. I also beg for protection from the rivers like mother and the mountains in Kurukshetra. O sun and usha! I pray to both of you to keep me sinless. Known mon do our good today. (2)

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