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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 42 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 42 • ऋचा / मन्त्र 5

10.42.5

Mantra ID: 10.42.5

धनं॒ न स्य॒न्द्रं ब॑हु॒लं यो अ॑स्मै ती॒व्रान्सोमा॑ँ आसु॒नोति॒ प्रय॑स्वान् । तस्मै॒ शत्रू॑न्सु॒तुका॑न्प्रा॒तरह्नो॒ नि स्वष्ट्रा॑न्यु॒वति॒ हन्ति॑ वृ॒त्रम् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.42.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो हव्य वाला यजमान इंद्र के लिए इस प्रकार नशीला सोमरस निचोड़ता है, जिस प्रकार कोई व्यक्ति दरिद्र को देने के लिए गाय या अश्व आदि धन का संस्कार करता है, इंद्र उसके शक्तिशाली, संतानसहित एवं शोभन आयुधों वाले शत्रुओं को उससे अलग हटाते हैं एवं उसका उपद्रव शांत करते हैं. (५)

EN English Translation

The havya host squeezes the intoxicating somras for Indra in this way, just as a person performs the rites of wealth like a cow or an horse, etc., to give to the poor, Indra separates his powerful, children and brave armaments enemies from him and calms his nuisance. (5)

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