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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 51 • Mantra / Rik 8

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 51 • ऋचा / मन्त्र 8

10.51.8

Mantra ID: 10.51.8

प्र॒या॒जान्मे॑ अनुया॒जाँश्च॒ केव॑ला॒नूर्ज॑स्वन्तं ह॒विषो॑ दत्त भा॒गम् । घृ॒तं चा॒पां पुरु॑षं॒ चौष॑धीनाम॒ग्नेश्च॑ दी॒र्घमायु॑रस्तु देवाः ॥ (८)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.51.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अग्नि ने कहा—“हे देवो! तुम मुझे यज्ञ के प्रारंभ वाले, अंत वाले तथा असाधारण हव्य भाग अधिक मात्रा में दो. तुम मुझे जल का सार अंश घृत, ओषधियों से उत्पन्न प्रधान भाग एवं दीर्घ आयु दो.” (८)

EN English Translation

The agni said, "O gods! You give me more of the beginning, the end and the extraordinary parts of the yajna. You give me the essence of water, the principal part of the water produced by the herbs and the long life." (8)

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