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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 63 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 63 • ऋचा / मन्त्र 5

10.63.5

Mantra ID: 10.63.5

स॒म्राजो॒ ये सु॒वृधो॑ य॒ज्ञमा॑य॒युरप॑रिह्वृता दधि॒रे दि॒वि क्षय॑म् । ताँ आ वि॑वास॒ नम॑सा सुवृ॒क्तिभि॑र्म॒हो आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं स्व॒स्तये॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.63.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपने तेज से भली-भांति सुशोभित एवं भली प्रकार उन्नत जो देव यज्ञ में आते हैं एवं किसी के द्वारा भी अहिंसित होकर स्वर्ग में रहते हैं, उन महान्‌ देवों और अदिति की सेवा कल्याण के निमित्त नमस्कार एवं शोभन स्तुतियों द्वारा करो. (५)

EN English Translation

Serve those great gods and Goddesses and Aditi who are well-groomed and well-advanced with your swiftness and live in heaven without any one, for the welfare of those great gods and Aditi. (5)

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