Rigveda Quick Jump
Navigate to any Mandal or Mantra / Rik
10.7.3
अ॒ग्निं म॑न्ये पि॒तर॑म॒ग्निमा॒पिम॒ग्निं भ्रात॑रं॒ सद॒मित्सखा॑यम् । अ॒ग्नेरनी॑कं बृह॒तः स॑पर्यं दि॒वि शु॒क्रं य॑ज॒तं सूर्य॑स्य ॥ (३)
HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें
ऋग्वेद मन्त्र 10.7.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
मैं अग्नि को ही पिता, बंधु, भ्राता तथा नित्य मित्र मानता हूं. मैं अग्नि के मुख की उसी प्रकार सेवा करता हूं, जिस प्रकार द्युलोक में स्थित, पूजायोग्य एवं दीप्तिशाली सूर्यमंडल की आराधना की जाती है. (३)
EN English Translation
I consider Agni to be a father, a brother, a brother and a constant friend. I serve the mouth of agni in the same way as the worshipable and radiant Suryamandal, located in Duloka, is worshipped. (3)