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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 85 • Mantra / Rik 12

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 85 • ऋचा / मन्त्र 12

10.85.12

Mantra ID: 10.85.12

शुची॑ ते च॒क्रे या॒त्या व्या॒नो अक्ष॒ आह॑तः । अनो॑ मन॒स्मयं॑ सू॒र्यारो॑हत्प्रय॒ती पति॑म् ॥ (१२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.85.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सूर्या पतिगृह के लिए चलते समय दोनों कान तुम्हारी गाड़ी के पहिए थे एवं वायु उन में अरों के समान थे. सूर्या इस प्रकार की मनरूपी गाड़ी पर सवार हुई. (१२)

EN English Translation

O Surya, while walking for the husband's home, both ears were the wheels of your car and the air was like arrows in them. Surya rode on this kind of car. (12)

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