Rigveda Quick Jump
Navigate to any Mandal or Mantra / Rik
10.86.12
नाहमि॑न्द्राणि रारण॒ सख्यु॑र्वृ॒षाक॑पेरृ॒ते । यस्ये॒दमप्यं॑ ह॒विः प्रि॒यं दे॒वेषु॒ गच्छ॑ति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (१२)
HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें
ऋग्वेद मन्त्र 10.86.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
“हे इंद्राणी! मैं अपने मित्र वृषाकपि के बिना प्रसन्न नहीं रह सकता. उसीको प्रसन्न करने वाला हवि देवों के समीप जाता है. इंद्र सबसे श्रेष्ठ हैं.” (१२)
EN English Translation
"O Indrani! I can't be happy without my friend Vrisakapi. The one who pleases him goes to the gods. Indra is the best." (12)