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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 91 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 91 • ऋचा / मन्त्र 2

10.91.2

Mantra ID: 10.91.2

स द॑र्शत॒श्रीरति॑थिर्गृ॒हेगृ॑हे॒ वने॑वने शिश्रिये तक्व॒वीरि॑व । जनं॑जनं॒ जन्यो॒ नाति॑ मन्यते॒ विश॒ आ क्षे॑ति वि॒श्यो॒३॒॑ विशं॑विशम् ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.91.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दर्शनीय शोभा वाले, अतिथि एवं मानहितैषी अग्नि यजमानों के घरों और वनों में निवास करते हैं. वे गतिशील के समान किसी व्यक्ति को नहीं छोड़ते. प्रजाहितकारी अग्नि मानवों के पास जाते हैं एवं सभी प्रजाओं का आश्रय लेते हैं. (२)

EN English Translation

The scenics, guests and dignitaries live in the houses and forests of agni hosts. They don't leave a person like dynamic. The pro-people agnis go to the human beings and take shelter of all the subjects. (2)

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