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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 91 • Mantra / Rik 7

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 91 • ऋचा / मन्त्र 7

10.91.7

Mantra ID: 10.91.7

वातो॑पधूत इषि॒तो वशा॒ँ अनु॑ तृ॒षु यदन्ना॒ वेवि॑षद्वि॒तिष्ठ॑से । आ ते॑ यतन्ते र॒थ्यो॒३॒॑ यथा॒ पृथ॒क्छर्धां॑स्यग्ने अ॒जरा॑णि॒ धक्ष॑तः ॥ (७)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.91.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! जब तुम वायु द्वारा कंपित वनस्पतियों के वशीभूत होकर एवं वनस्पतियों को व्याप्त करके इधर गति उत्पन्न करते हो, उस समय काष्ठ दहन के कारण उत्पन्न तुम्हारी ज्वालाएं रथियों के समान अपना तेज चालित करती हैं. (७)

EN English Translation

O agni! When you move here by being filled with vegetation vibrated by the wind and permeating the vegetation, your flames caused by wood burning move their own fast as chariots. (7)

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