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3.13.2
ऋ॒तावा॒ यस्य॒ रोद॑सी॒ दक्षं॒ सच॑न्त ऊ॒तयः॑ । ह॒विष्म॑न्त॒स्तमी॑ळते॒ तं स॑नि॒ष्यन्तोऽव॑से ॥ (२)
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ऋग्वेद मन्त्र 3.13.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
द्यावापृथ्वी जिस अग्नि के वश में हैं, देव उसके बल की सेवा करते हैं. वह सत्यकर्म वाला है. (२)
EN English Translation
The god serves the force of the agni with which the devapatrithvi is in control of. He is a true-doer. (2)