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ऋग्वेद

Mandal 3 • Sukta 24 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 3 • सूक्त 24 • ऋचा / मन्त्र 2

3.24.2

Mantra ID: 3.24.2

अग्न॑ इ॒ळा समि॑ध्यसे वी॒तिहो॑त्रो॒ अम॑र्त्यः । जु॒षस्व॒ सू नो॑ अध्व॒रम् ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 3.24.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे यज्ञ को प्रेम करने वाले तथा मरणरहित अग्नि! तुम्हें उत्तर वेदी पर जलाया जाता है. बुम हमारे यज्ञ की भली प्रकार सेवा करो. (२)

EN English Translation

O agni who loves yajna and without death! You are lit on the north altar. Bum serve our yajna well. (2)

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