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3.46.4
उ॒रुं ग॑भी॒रं ज॒नुषा॒भ्यु१॒॑ग्रं वि॒श्वव्य॑चसमव॒तं म॑ती॒नाम् । इन्द्रं॒ सोमा॑सः प्र॒दिवि॑ सु॒तासः॑ समु॒द्रं न स्र॒वत॒ आ वि॑शन्ति ॥ (४)
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ऋग्वेद मन्त्र 3.46.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे महान्, गंभीर, स्वभाव से ही उग्र, सभी जगह व्याप्त व स्लुतिकर्तताओं के रक्षक इंद्र! एक दिन पहले निचोड़ा गया सोम तुम्हारे पास उसी प्रकार जाता है, जिस प्रकार सरिताएं सागर में समा जाती हैं. (४)
EN English Translation
O great, serious, fierce by nature, everywhere and the protector of the sultryness Indra! The som, squeezed a day before, goes to you in the same way that the saritas are absorbed in the ocean. (4)