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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 64 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 64 • ऋचा / मन्त्र 5

9.64.5

Mantra ID: 9.64.5

शु॒म्भमा॑ना ऋता॒युभि॑र्मृ॒ज्यमा॑ना॒ गभ॑स्त्योः । पव॑न्ते॒ वारे॑ अ॒व्यये॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.64.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यज्ञाभिलाषी यजमानों द्वारा अलंकृत एवं दोनों हाथों से मसले जाते हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हैं. (५)

EN English Translation

The yajnabhilagis, embellished by hosts and mashed with both hands, are snagged on the dashapavitra made of som sheep's hair. (5)

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