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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 80 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 80 • ऋचा / मन्त्र 1

9.80.1

Mantra ID: 9.80.1

सोम॑स्य॒ धारा॑ पवते नृ॒चक्ष॑स ऋ॒तेन॑ दे॒वान्ह॑वते दि॒वस्परि॑ । बृह॒स्पते॑ र॒वथे॑ना॒ वि दि॑द्युते समु॒द्रासो॒ न सव॑नानि विव्यचुः ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.80.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यजमानों को देखने वाले सोम की धारा टपकती है. सोम यज्ञ के द्वारा झुलोक के ऊपर वर्तमान देवों का हनन करते हैं. सोम स्तोता के शब्द से चमकते हैं एवं जिस तरह धरती को सागर घेरे हुए है, उसी प्रकार वे तीनों सवनों को व्याप्त करते हैं. (१)

EN English Translation

The stream of the som overlooking the hosts drips. By the Som yajna, the present deities on top of the jhuloka are violated. The somas shine with the word of the stota and just as the ocean surrounds the earth, so they permeate the three saavanas. (1)

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