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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 83 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 83 • ऋचा / मन्त्र 2

9.83.2

Mantra ID: 9.83.2

तपो॑ष्प॒वित्रं॒ वित॑तं दि॒वस्प॒दे शोच॑न्तो अस्य॒ तन्त॑वो॒ व्य॑स्थिरन् । अव॑न्त्यस्य पवी॒तार॑मा॒शवो॑ दि॒वस्पृ॒ष्ठमधि॑ तिष्ठन्ति॒ चेत॑सा ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.83.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

शत्रुओं को कष्ट देने वाले सोम का पवित्र अंश द्युलोक के ऊंचे स्थान पर विस्तृत है। उसकी तेजस्वी किरणें विविध प्रकार से स्थित होती हैं. सोम का शीघ्रगामी रस यजमान की रक्षा करता है. इसके बाद वह देवों के समीप जाने वाली बुद्धि से स्वर्ग के ऊंचे स्थान में मिलता है. (२)

EN English Translation

The sacred part of The Som, who has tormented the enemies, extends to the high place of Duloka. Its bright rays are located in various ways. The early juice of Som protects the host. After this, he is found in the high place of heaven by the wisdom that goes near to the gods. (2)

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