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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 86 • Mantra / Rik 14

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 86 • ऋचा / मन्त्र 14

9.86.14

Mantra ID: 9.86.14

द्रा॒पिं वसा॑नो यज॒तो दि॑वि॒स्पृश॑मन्तरिक्ष॒प्रा भुव॑ने॒ष्वर्पि॑तः । स्व॑र्जज्ञा॒नो नभ॑सा॒भ्य॑क्रमीत्प्र॒त्नम॑स्य पि॒तर॒मा वि॑वासति ॥ (१४)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.86.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

स्वर्ग को छूने वाले, तेजरूप कवच को पहनने वाले, यज्ञ के योग्य एवं जल से अंतरिक्ष को पूर्ण करने वाले सोम जल में मिलकर एवं स्वर्ग को उत्पन्न करते हुए जल के साथ बहते हैं एवं जल के पालक तथा प्राचीन इंद्र की सेवा करते हैं. (१४)

EN English Translation

The Soms who touch heaven, who wear a sharp armor, are worthy of yajna and complete the space with water, flow in water together and with water, producing heaven, and serve the water's guardian and the ancient Indra. (14)

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