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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 86 • Mantra / Rik 27

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 86 • ऋचा / मन्त्र 27

9.86.27

Mantra ID: 9.86.27

अ॒स॒श्चतः॑ श॒तधा॑रा अभि॒श्रियो॒ हरिं॑ नव॒न्तेऽव॒ ता उ॑द॒न्युवः॑ । क्षिपो॑ मृजन्ति॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑तं तृ॒तीये॑ पृ॒ष्ठे अधि॑ रोच॒ने दि॒वः ॥ (२७)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.86.27 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

आपस में मिली हुई, सौ धाराओं वाली व सोम का सहारा लेने वाली सूर्यकिरणे हरे रंग के सोम को प्राप्त करती हैं. उंगलियां किरणों से ढके हुए सोम एवं द्युलोक के दीप्त स्थान पर स्थित सोम को मसलती हैं. (२७)

EN English Translation

The sunkirane, which is joined together, with a hundred streams and supporting the mon, receives the green som. The fingers massage the mon covered with rays and the som located at the bright spot of the dulok. (27)

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