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ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1 • मन्त्र 15
Ishavasya Upanishad (Isha) 1.15
Mantra: 1.15
[Ishopanishad_1.15]
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५॥
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
प्रश्न-परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान मनुष्य को क्यों नहीं होता।
चमकीले सुवर्णादि के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे सबके पोषक परमात्मन् ! आप उस सत्य स्वरूप के दर्शन के लिये उस आवरण को हटा दो। इसका यह आशय है कि धनका लालच ही मनुष्य को धर्म से से विमुख कर देता है। धन के लोभ मे मनुष्य अधर्म की ओर प्रवृत होता है। ऐसी दशा में सत्य स्वरूप भगवान् का दर्शन मनुष्य को कदापि नहीं हो सकता, इसलिये मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन् ! आप उस आवरण को हटा दें, जिससे अविनाशी प्रभु के दर्शन हो सकें (यहां सत्य शब्द धर्म और ईश्वर दोनों का वाचक है ) । ॥१५॥
चमकीले सुवर्णादि के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे सबके पोषक परमात्मन् ! आप उस सत्य स्वरूप के दर्शन के लिये उस आवरण को हटा दो। इसका यह आशय है कि धनका लालच ही मनुष्य को धर्म से से विमुख कर देता है। धन के लोभ मे मनुष्य अधर्म की ओर प्रवृत होता है। ऐसी दशा में सत्य स्वरूप भगवान् का दर्शन मनुष्य को कदापि नहीं हो सकता, इसलिये मन्त्र में प्रार्थना की गई है कि हे परमात्मन् ! आप उस आवरण को हटा दें, जिससे अविनाशी प्रभु के दर्शन हो सकें (यहां सत्य शब्द धर्म और ईश्वर दोनों का वाचक है ) । ॥१५॥
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