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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 1

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 1
वाजश्रवसका दान

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.1

Mantra: 1.1 [Kathopanishad_1.1]

ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस॥ १॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 1 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

प्रसिद्ध है कि यज्ञफलके इच्छुक वाजश्रवाके पुत्रने [विश्वजित् यज्ञमें] अपना सारा धन दे दिया। उसका नचिकेता नामक एक प्रसिद्ध पुत्र था॥ १॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था। उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थस्मरणार्थौ निपातौ। वाजमन्नं तद्दानानिमित्तं श्रवो यशो यस्य स वाजश्रवा रूढितो वा। तस्यापत्यं वाजश्रवसः किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे तत्फलं कामयमानः। स तस्मिन्क्रतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान्। तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव॥ १॥ 【भाष्यार्थ】 यहाँ जो आख्यायिका है वह विद्याकी स्तुतिके लिये है। उशन् अर्थात् कामनावाला। 'ह' और 'वै' ये निपात पहले बीते हुए वृत्तान्तको स्मरण करानेके लिये हैं। 'वाज' अन्नको कहते हैं; उसके दानादिके कारण जिसका श्रव यानी यश हो उसे वाजश्रवा कहते हैं; अथवा रूढिसे भी यह उसका नाम हो सकता है। उस वाजश्रवाके पुत्र वाजश्रवसने, जिसमें सर्वस्व समर्पण किया जाता है उस विश्वजित् यज्ञद्वारा, उसके फलकी इच्छासे यजन किया। उस यज्ञमें उसने सर्ववेदस् यानी अपना सारा धन दे डाला। कहते हैं, उस यजमानका नचिकेता नामक एक पुत्र था॥ १॥
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