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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 5

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 5

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.5

Mantra: 1.5 [Kathopanishad_1.5]

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 5 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं बहुत-से [शिष्य या पुत्रों]-में तो प्रथम (मुख्य वृत्तिसे) चलता हूँ और बहुतोंमें मध्यम (मध्यम वृत्तिसे) जाता हूँ। यमका ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥ ५ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्या शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव वृत्त्यैमि। नाधमया कदाचिदपि। तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्रं मां मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् पिता। स किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं 【भाष्यार्थ】 मैं बहुत-से शिष्य अथवा पुत्रोंमें तो प्रथम अर्थात् आगे रहकर मुख्य शिष्यादि वृत्तिसे चलता हूँ तथा बहुत- से मध्यम शिष्यादिमें मध्यम रहकर मध्यम-वृत्तिसे बर्तता हूँ। अधम वृत्तिसे मैं कभी नहीं रहता। उस ऐसे विशिष्ट- गुणसम्पन्न पुत्रको भी पिताने 'मैं तुझे मृत्युको देता हूँ' ऐसा कहा। परन्तु यमका ऐसा कौन-सा कर्तव्य—प्रयोजन इन्हें पूर्ण करना है जिसे ये इस प्रकार दिये हुए मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे? अवश्य 【शाङ्करभाष्यम्】 मया प्रत्तेन करिष्यति यत्कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनम् अनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान् पिता। तथापि तत्पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्टं किं मयोक्तमिति ॥ ५ ॥ 【भाष्यार्थ】 किसी प्रयोजनकी अपेक्षा न करके ही पिताने क्रोधवश ऐसा कहा है। तथापि ‘पिताका वचन मिथ्या न हो’ ऐसा विचारकर उसने अपने पितासे, जो यह सोचकर कि ‘मैंने क्या कह डाला ?’ शोकातुर हो रहे थे, खेदपूर्वक कहा ॥ ५ ॥
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