Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 2, मन्त्र 10

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 2 • मन्त्र 10
कर्मफलकी अनित्यता

Katha Upanishad (Kathopanishad) 2.10

Mantra: 2.10 [Kathopanishad_2.10]

जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेताश्चितोऽग्नि- रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं यह जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनोंद्वारा वह नित्य [आत्मा] प्राप्त नहीं किया जा सकता। तब मेरे द्वारा नाचिकेत अग्निका चयन किया गया। उन अनित्य पदार्थोंसे ही मैं [आपेक्षिक] नित्य [याम्यपद]-को प्राप्त हुआ हूँ॥ १०॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 जानाम्यहं शेवधिरिति निधिः कर्मफललक्षणो निधिरिव प्रार्थ्यत इति। असावनित्यमनित्य इति जानामि। न हि यस्मादनित्यैः— 【भाष्यार्थ】 जिसके लिये निधि (खजाने)—के समान प्रार्थना की जाती है वह कर्मफलरूप निधि ही 'शेवधि' है। यह अनित्य—सदा न रहनेवाली है—ऐसा मैं जानता हूँ। क्योंकि इन 【शाङ्करभाष्यम्】 रध्रुवैर्नित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः। यस्त्वनित्यसुखात्मकः शेवधिः स एवानित्यैर्द्रव्यैः प्राप्यते। हि यतस्तस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः, अनित्यैर्द्रव्यैः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निर्निवर्तित इत्यर्थः। तेनाहमधिकारमापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि ॥ १० ॥ 【भाष्यार्थ】 अनित्य यानी अस्थिर साधनोंसे वह परमात्मा नामक नित्य—स्थिर निधि प्राप्त नहीं की जा सकती। जो निधि अनित्यसुखस्वरूप है वही अनित्य पदार्थोंसे प्राप्त होती है। क्योंकि ऐसा है इसलिये-मैंने यह जान-बूझकर भी कि 'अनित्य साधनोंसे नित्यकी प्राप्ति नहीं होती' नाचिकेत अग्निका चयन किया था; अर्थात् पशु आदि अनित्य पदार्थोंसे स्वर्ग-सुखके साधनस्वरूप उस अग्निका सम्पादन किया था। उसीसे मैं अधिकार-सम्पन्न होकर आपेक्षिक नित्य स्वर्ग नामक याम्यस्थानको प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ॥