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कठोपनिषद् • वल्ली 2, मन्त्र 9

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 2 • मन्त्र 9

Katha Upanishad (Kathopanishad) 2.9

Mantra: 2.9 [Kathopanishad_2.9]

नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ। यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे प्रियतम ! सम्यक् ज्ञानके लिये शुष्क तार्किकसे भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा कही हुई यह बुद्धि, जिसे कि तू प्रास हुआ है, 'तर्कद्वारा प्रास होने योग्य नहीं है । अहा ! तू बड़ा ही सत्य धारणावाला है । हे नचिकेतः ! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला प्रास हो ॥ ९ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 अतोऽन्यप्रोक्त आत्मनि उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्ममतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्ध्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थः। नापनेतव्या वा न हातव्या तार्किको ह्यानागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथयति। अत एव च येयमागमप्रभूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेन आचार्येणैव तार्किकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम। 【भाष्यार्थ】 अतः अभेददर्शी आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए आत्मामें उत्पन्न हुई जो यह शास्त्रप्रतिपाद्य आत्मविषयक मति है वह तर्कसे अर्थात् अपनी बुद्धिके ऊहापोहमात्रसे प्राप्त होने योग्य नहीं है। अथवा [यह समझो कि] यह आत्मबुद्धि तर्कशक्तिसे अपनेतव्य यानी छोड़ी जाने योग्य नहीं है, क्योंकि तार्किक तो अध्यात्मशास्त्रसे अनभिज्ञ होता है, वह अपनी बुद्धिसे कल्पना किया हुआ चाहे जो कहता रहता है। अतः हे प्रेष्ठ—प्रियतम ! यह जो शास्त्रजनित आत्मबुद्धि है वह तो तार्किकसे भिन्न किसी शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा उपदेश की जानेपर ही सम्यक् ज्ञानकी कारण होती है। 【शाङ्करभाष्यम्】 का पुनः सा तर्कागम्या मतिरित्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 अच्छा तो, तर्कसे प्राप्त न होने योग्य वह मति कौन-सी है? इसपर कहते हैं— 【शाङ्करभाष्यम्】 यां त्वं मतिं मद्वरप्रदानेन 【भाष्यार्थ】 जिस मतिको तूने मेरे वरप्रदानसे 【शाङ्करभाष्यम्】 आपः प्राप्तवानसि। सत्या अवितथविषया धृतिर्यस्य तव स त्वं सत्यधृतिर्बतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये। त्वादृक्त्व- तुल्यो नोऽस्मभ्यं भूयाद्भवताद्वक्तव्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा; कीदृग्यादृक्त्वं हे नचिकेतः प्रष्टा॥ ९॥ 【भाष्यार्थ】 प्राप्त किया है। जिस तेरी धृति सत्य अर्थात् यथार्थ पदार्थको विषय करनेवाली है वह तू सत्यधृति है। 'बत' इस अव्ययसे अनुकम्पा करते हुए यमराज आगे कहे जानेवाले विज्ञानकी स्तुतिके लिये नचिकेतासे कहते हैं—'हे नचिकेतः! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला और भी पुत्र अथवा शिष्य मिले। परन्तु वह हो कैसा? जैसा कि तू प्रश्न करनेवाला है'॥ ९॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 पुनरपि तुष्ट आह— 【भाष्यार्थ】 नचिकेतासे प्रसन्न हुए मृत्युने फिर भी कहा—