Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 2, मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 2 • मन्त्र 8

Katha Upanishad (Kathopanishad) 2.8

Mantra: 2.8 [Kathopanishad_2.8]

न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति अणीयान्ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

कई प्रकारसे कल्पना किया हुआ यह आत्मा नीच पुरुषद्वारा कहे जानेपर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता। अभेददर्शी आचार्यद्वारा उपदेश किये गये इस आत्मामें [अस्ति-नास्तिरूप] कोई गति नहीं है, क्योंकि यह सूक्ष्म परिमाणवालोंसे भी सूक्ष्म और दुर्विज्ञेय है॥ ८॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 न हि नरेण मनुष्येणावरेण प्रोक्तोऽवरेण हीनेन प्राकृतबुद्धिना इत्येतदुक्त एष आत्मा यं त्वं मां पृच्छसि । न हि सुष्ठु सम्यग्विज्ञेयो विज्ञातुं शक्यो यस्माद् बहुधास्ति नास्ति कर्ताकर्ता शुद्धोऽशुद्ध इत्याद्यनेकधा चिन्त्यमानो वादिभिः । 【भाष्यार्थ】 यह आत्मा, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, किसी अवर—हीन यानी साधारण बुद्धिवाले मनुष्यसे कहा जानेपर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता; क्योंकि यह वादियोंद्वारा अस्ति-नास्ति, कर्ता-अकर्ता एवं शुद्ध-अशुद्ध—इस प्रकार अनेक तरहसे चिन्तन किया जाता है। 【शाङ्करभाष्यम्】 कथं पुनः सुविज्ञेय इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 तो फिर यह किस प्रकार अच्छी तरह जाना जाता है? इसपर कहते हैं— 【शाङ्करभाष्यम्】 विद्योपलब्धौ अनन्यप्रोक्तेऽनन्येन देशिकादेशस्य अपृथग्दर्शिना प्राधान्यम् आचार्येण प्रतिपाद्य-ब्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त आत्मनि गतिरनेकधास्ति नास्तीत्यादिलक्षणा चिन्ता गतिरत्रास्मिन् आत्मनि नास्ति न विद्यते सर्वविकल्पगति-प्रत्यस्तमितत्वादात्मनः । 【भाष्यार्थ】 अनन्यप्रोक्त—अनन्य अर्थात् अपने प्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए अपृथग्दर्शी आचार्यद्वारा कहे हुए इस आत्मामें अस्ति-नास्तिरूप गति यानी चिन्ता नहीं है, क्योंकि आत्मा सम्पूर्ण विकल्पोंकी गतिसे रहित है। 【शाङ्करभाष्यम्】 अथवा स्वात्मभूतेऽनन्यस्मिन् आत्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्ते गतिः, अत्रान्यावगतिर्नास्ति ज्ञेयस्यान्यस्य अभावात् । ज्ञानस्य ह्येषा परा निष्ठा यदात्मकत्वविज्ञानम् । 【भाष्यार्थ】 अथवा अनन्यप्रोक्त—अपने स्वरूपभूत अनन्य आत्माका गुरुद्वारा उपदेश किये जानेपर अन्य ज्ञेय वस्तुका अभाव हो जानेके कारण उसमें कोई गति यानी अन्य अवगति (ज्ञान) नहीं रहती; क्योंकि आत्माके एकत्वका जो विज्ञान है यही ज्ञानकी परा निष्ठा 【शाङ्करभाष्यम्】 अतोऽवगन्तव्याभावान्न गतिः, अत्रावशिष्यते। संसारगतिर्वात्र नास्त्यनन्य आत्मनि प्रोक्ते नान्तरीयकत्वात्तद्विज्ञानफलस्य मोक्षस्य। 【शाङ्करभाष्यम्】 अथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्मभूतेनाचार्येण प्रोक्त आत्मनि अगतिरनवबोधोऽपरिज्ञानम् अत्र नास्ति। भवत्येवावगतिस्तद्विषया श्रोतुस्तदस्म्यहमित्याचार्यस्येवेत्यर्थः। 【शाङ्करभाष्यम्】 एवं सुविज्ञेय आत्मा आगमवता आचार्येणानन्यतया प्रोक्तः। इतरथा ह्यणीयानणुप्रमाणादपि सम्पद्यत आत्मा। अतर्क्यमतर्क्यः स्वबुद्ध्याभ्यूहेन केवलेन तर्केण। तर्क्यमाणेऽणुपरिमाणे केनचित् स्थापित आत्मनि ततो ह्यणुतरम् अन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणुतममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा क्वचिद्विद्यते॥८॥ 【भाष्यार्थ】 है। अतः ज्ञेय वस्तुका अभाव हो जानेके कारण फिर यहाँ कोई गति नहीं रहती। अथवा उस अनन्य अर्थात् स्वात्मभूत आत्मतत्त्वके उपदेश कर दिये जानेपर संसारकी गति नहीं रहती, क्योंकि उसके अनन्तर तुरन्त ही आत्मविज्ञानका फलरूप मोक्ष प्राप्त हो जाता है। 【भाष्यार्थ】 अथवा जिसका आगे वर्णन किया जायगा उस ब्रह्मात्मभूत आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए इस आत्मतत्त्वमें फिर अगति—अनवबोध अर्थात् अपरिज्ञान नहीं रहता। अर्थात् आचार्यके समान उस श्रोताको भी यह आत्मविषयक ज्ञान हो ही जाता है कि 'वह (ब्रह्म) मैं हूँ'। 【भाष्यार्थ】 इस प्रकार शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा अभिन्नरूपसे कहा हुआ आत्मा सुविज्ञेय होता है। नहीं तो, यह अणुप्रमाण वस्तुओंसे भी अणु हो जाता है; अपनी बुद्धिसे निकाले हुए केवल तर्कद्वारा इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कोई पुरुष तर्क करके उस अणुपरिमाण आत्माको स्थापित भी करे तो दूसरा उससे भी अणु तथा तीसरा उससे भी अत्यन्त अणु स्थापित कर देगा, क्योंकि कुतर्ककी स्थिति कहीं भी नहीं है ॥ ८ ॥