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कठोपनिषद् • वल्ली 2, मन्त्र 3

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 2 • मन्त्र 3

Katha Upanishad (Kathopanishad) 2.3

Mantra: 2.3 [Kathopanishad_2.3]

स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । नैताः सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे नचिकेतः ! उस तूने पुत्र-वित्तादि प्रिय और अप्सरा आदि

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【भाष्यार्थ】 प्रियरूप भोगोंको, उनका असारत्व चिन्तन करके त्याग दिया है और जिसमें बहुत-से मनुष्य डूब जाते हैं, उस इस धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुआ ॥ ३ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 स त्वं पुनः पुनर्मया प्रलोभ्यमानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन् प्रियरूपांश्चाप्सरःप्रभृतिलक्षणान् कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तेषामनित्यत्वासारत्वादिदोषान् हे नचिकेतोऽत्यस्राक्षीरित्युत्सृष्टवान् परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता तव । नैतामवाप्तवानसि सृङ्कां सृतिं कुत्सितां मूढजनप्रवृत्तां वित्तमयीं धनप्रायाम् । यस्यां सृतौ मज्जन्ति सीदन्ति बहवोऽनेके मूढा मनुष्याः ॥ ३ ॥ 【भाष्यार्थ】 हे नचिकेतः ! तेरी बुद्धिमत्ता धन्य है; जिस तूने कि मेरे द्वारा बारम्बार प्रलोभित किये जानेपर भी पुत्रादि प्रिय तथा अप्सरा आदि प्रियरूप भोगोंको, उनकी अनित्यता और असारता आदि दोषोंका विचार करके परित्याग कर दिया, और जिसमें मूढ पुरुष प्रवृत्त हुआ करते हैं उस वित्तमयी—धनप्राया निन्दित गतिको तू प्राप्त नहीं हुआ, जिस मार्गमें कि बहुत-से मूढ पुरुष डूब जाते अर्थात् दुःख उठाते हैं ॥ ३ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत इत्युक्तं तत्कस्माद्यतः— 【भाष्यार्थ】 'उनमेंसे श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयको वरण करता है वह स्वार्थसे पतित हो जाता है' ऐसा जो ऊपर (इस वल्लीके प्रथम मन्त्रमें) कहा गया है, सो क्यों? [इसपर यमराज कहते हैं,] क्योंकि—