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कठोपनिषद् • वल्ली 2, मन्त्र 4

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 2 • मन्त्र 4

Katha Upanishad (Kathopanishad) 2.4

Mantra: 2.4 [Kathopanishad_2.4]

दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो विद्या और अविद्यारूपसे जानी गयी हैं वे दोनों अत्यन्त विरुद्ध स्वभाववाली और विपरीत फल देनेवाली हैं। मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ, क्योंकि तुझे बहुत-से भोगोंने भी नहीं लुभाया ॥ ४ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 दूरं दूरेण महतान्तरेणैते विपरीते अन्योन्यावृत्तरूपेविवेका-विवेकात्मकत्वात्तमःप्रकाशाइव । विषूची विषूच्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्षहेतुत्वेनेत्येतत् । के ते इत्युच्यते । या चाविद्या प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्ज्ञातावगता पण्डितैः । तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । कस्माद्यस्मादविद्वद्बुद्धिप्रलोभिनः कामा अप्सरःप्रभृतयो बहवोऽपि त्वा त्वां नालोलुपन्त न विच्छेदं कृतवन्त: श्रेयोमार्गादात्मोप-भोगाभिवाञ्छासम्पादनेन । अतो विद्यार्थिनं श्रेयोभाजनं मन्य इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ 【भाष्यार्थ】 ये दोनों प्रकाश और अन्धकारके समान विवेक और अविवेकरूप होनेसे 'दूरम्' अर्थात् महान् अन्तरके साथ विपरीत हैं—आपसमें एक-दूसरेसे व्यावृत्तरूप हैं। और विषूची अर्थात् नाना गतिवाले हैं यानी संसार और मोक्षके कारण होनेसे विभिन्न फलयुक्त हैं। वे कौन हैं—इसपर कहते हैं—'जो कि पण्डितोंद्वारा प्रेयको विषय करनेवाली अविद्या तथा श्रेयोविषया विद्यारूपसे जानी गयी हैं। उनमें तुझ नचिकेताको मैं विद्याभिलाषी अर्थात् विद्यार्थी मानता हूँ। क्यों मानता हूँ? क्योंकि अविवेकियोंकी बुद्धिको प्रलोभित करनेवाले अप्सरा आदि बहुत-से भोग भी तुम्हें लुभा नहीं सके—उन्होंने तेरे हृदयमें अपने भोगकी इच्छा उत्पन्न करके तुझे श्रेयोमार्गसे विचलित नहीं किया। अतः मैं तुझे विद्यार्थी यानी श्रेयका पात्र समझता हूँ—यह इसका अभिप्राय है ॥ ४ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 ये तु संसारभाजना:— 【भाष्यार्थ】 किन्तु जो संसारके पात्र हैं—