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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 13

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 13
लयचिन्तन

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.13

Mantra: 3.13 [Kathopanishad_3.13]

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 13 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाशस्वरूप बुद्धिमें लय करे, बुद्धिको महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको शान्त आत्मामें नियुक्त करे ॥ १३ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यच्छेन्नियच्छेदुपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी; किम्? वाग्वाचम् । वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रिया- णाम् । क्व? मनसी । मनसीतिच्छान्दसं दैर्घ्यम् । तच्च मनो यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे बुद्धौ आत्मनि । बुद्धिर्हि मन-आदिकरणा- न्याप्नोतीत्यात्मा प्रत्यक् तेषाम् । ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत् । प्रथमजवत् 【भाष्यार्थ】 विवेकी पुरुष 'यच्छेत्' अर्थात् नियुक्त करे—उपसंहार करे; किसका उपसंहार करे? वाक् अर्थात् वाणीका । यहाँ वाक् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका उपलक्षण करानेके लिये है । कहाँ उपसंहार करे? मनमें; 'मनसी' पदमें ह्रस्व इकारके स्थानमें दीर्घ प्रयोग छान्दस है । फिर उस मनको ज्ञान अर्थात् प्रकाशस्वरूप बुद्धि—आत्मामें लीन करे । बुद्धि ही मन आदि इन्द्रियोंमें व्याप्त है, इसलिये वह उनका आत्मा— प्रत्यक्स्वरूप है। उस ज्ञानस्वरूप बुद्धिको प्रथम विकार महान् आत्मामें लीन 【शाङ्करभाष्यम्】 स्वच्छस्वभावमात्मनो विज्ञानम् आपादयेदित्यर्थः । तं च महान्तम् आत्मानं यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य आत्मनि ॥ १३ ॥ 【भाष्यार्थ】 करे अर्थात् प्रथम उत्पन्न हुए महत्तत्त्वके समान आत्माका स्वच्छ-स्वभाव विज्ञान प्राप्त करे। और महान् आत्माको जिसका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित है और जो अविक्रिय, सर्वान्तर तथा बुद्धिके सम्पूर्ण प्रत्ययोंका साक्षी है उस मुख्य आत्मामें लीन करे ॥ १३ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवं पुरुष आत्मनि सर्वं प्रविलाप्य नामरूपकर्मत्रयं यन्मिथ्याज्ञानविजृम्भितं क्रिया- कारकफललक्षणं स्वात्मयाथात्म्य- ज्ञानेन मरीच्युदकरज्जु- सर्पगगनमलानीव मरीचिरज्जुगगन- स्वरूपदर्शनेनैव स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो भवति यतोऽतस्त- दर्शनार्थम्— 【भाष्यार्थ】 मृगतृष्णा, रज्जु और आकाशके स्वरूपका ज्ञान होनेसे जैसे मृगजल, रज्जु-सर्प और आकाश-मालिन्यका बोध हो जाता है, उसी प्रकार मिथ्याज्ञानसे प्रतीत होनेवाले समस्त प्रपञ्च यानी नाम, रूप और कर्म इन तीनोंको, जो क्रिया, कारक और फलरूप ही हैं, स्वात्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरुष अर्थात् आत्मामें लीन करके मनुष्य स्वस्थ, प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका साक्षात्कार करनेके लिये—
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